Thursday, April 16, 2020

राज्य सभा

राज्य सभा ......✍

राज्यसभा  Bpsc✍
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राज्यसभा अपने नाम के अनुरूप राज्यों की परिषद है। यह अप्रत्यक्ष रूप से जनता का प्रतिनिधित्व करती है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा के सदस्यों की कुल संख्या 250 निश्चित की गई है। इनमें से 238 सदस्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों की संख्या संविधान की चौथी अनुसूची में अंकित की गई है। संविधान के अनुच्छेद 80(4) के अनुसार, राज्यों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन सम्बंधित राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। यह निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल वैकल्पिक मत द्वारा किया जाता है। जो व्यक्ति राज्यसभा का चुनाव लड़ना चाहता है उसका नाम विधानसभा के कम-से-कम 10 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित होना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 80(5) के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि संसद द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार मनोनीत अथवा निर्वाचित किये जाते हैं। राष्ट्रपति उन 12 व्यक्तियों को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करता है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो। वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं, जिनमें 233 सदस्य राज्यों एवं संघशासित प्रदेशों से निर्वाचित तथा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं।

राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर निश्चित किया जाता है। जिस राज्य की जनसंख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है, उस राज्य की अन्य राज्यों की अपेक्षा प्रतिनिधित्व भी अधिक दिया जाता है। उदाहरण के लिए, हरियाणा 5 प्रतिनिधि राज्यसभा में भेज सकता है जबकि अकेले उत्तर प्रदेश की 31 प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया है। राज्यसभा का पहली बार गठन 1952 में किया गया था ।

राज्यसभा के गठन में चार सिद्धांत निहित हैं- अर्ध संघीय, प्रतिनिधित्व सिद्धांत, संयुक्त पुनर्विचार और नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत तथा प्रख्यात और विशिष्ट व्यक्तियों को भारतीय राज-व्यवस्था से सम्बद्ध करने का सिद्धांत। राज्यसभा के गठन का निकट से अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यद्यपि इसके निर्वाचन की प्रक्रिया भिन्न है तथापि यह लोकसभा से मूलतः भिन्न नहीं है।

राज्यसभा की प्रासंगिकता
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आम चुनाव में जीतने वाली पार्टी लोकसभा में अपना बहुमत रखती है, किंतु राज्यसभा में ऐसा होना जरूरी नहीं होता। बहुमत प्राप्त विजयी दल का उल्लास तब ठंडा पड़ जाता है, जब कोई मामला या विधेयक राज्यसभा में अटक जाता है, जहां उसे बहुमत हासिल नहीं होता।

आलोचकों का मत है कि राज्यसभा वर्तमान यथार्थ की प्रतिबिंबित नहीं करती है तथा अनेक मामलों में जनादेश की अवहेलना करती है। उदाहरण के लिए, 1977 में जनता पार्टी सरकार को, 42वें संविधान संशोधन को निरस्त करने के, अपने चुनावी वायदे को पूरा करने में राज्यसभा के कारण अनेक कठिनाइयां उठानी पड़ीं। यह संशोधन आपातकाल के दौरान पारित किया गया था और इसी के विरोध में जन्मी प्रतिक्रिया के कारण जनता पार्टी को व्यापक जनादेश प्राप्त हुआ था।

 

संविधान निर्माताओं द्वारा राज्यसभा की निम्नलिखित भूमिकाओं को प्रकट किया गया था-

1.संघीय स्तर पर विधायी प्रक्रिया हेतु परिपक्व व वरिष्ठजनों (जो सक्रिय राजनीति की उठा-पटक या लोकसभा चुनावों की खुली प्रतिस्पर्द्धा में भाग लेने के इच्छुक नहीं होते) की सलाह व मार्ग-दर्शन को सुरक्षित रखना।
2.राज्यों को संसदीय स्तर पर, अपने दृष्टिकोणों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने हेतु समर्थ बनाना।
3.संसदीय विधायन के अंतर्गत कुछ हद तक नीतियों की निरंतरता को सुनिश्चित करना।

4.संसद के एक सदन के रूप में कार्य करना, जो न्यूनाधिक रूप में लोकसभा के साथ सहयोग करता है ताकि त्वरित प्रस्तावों पर दोनों सदनों के बीच पैदा किसी संघर्ष से बचने के रक्षोपाय खोजे जा सकें और विधायन कार्य सुगमतापूर्वक हो सके।

राज्यसभा के सदस्य (राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्यों को छोड़कर) राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। मनोनीत सदस्य विशिष्ट ज्ञान एवं व्यावहारिक अनुभव (साहित्य, विज्ञान, कला एवं समाज सेवा के क्षेत्र में) रखने वाले व्यक्ति होते हैं (अनुच्छेद 80)।

 राजनीतिक चालों से विलग तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले राज्यसभा के सदस्यों से सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि वे विभिन्न विधायी मानदंडों पर शांतिपूर्वक विचार-विमर्श करेंगे तथा राज्यसभा में वाद-विवाद की महत्ता पर निरंतर बल देते रहेंगे। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) में निर्दिष्ट किया गया है कि, किसी भी ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य के प्रतिनिधि अथवा राज्यों की परिषद के सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता, जो उस राज्य के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता नहीं है।  जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम का भाग-3 स्पष्ट करता है कि राज्यसभा का कोई सदस्य मात्र उसी राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिसका वह निवासी है। वर्ष 2003 में संसद ने जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर, राज्यसभा सदस्य के लिए उस राज्य विशेष के अधिवास की अपरिहार्यता को समाप्त कर दिया एवं साथ ही राज्यसभा के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था की भी समाप्त कर दिया। इस संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अगस्त 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में इस संशोधन की वैधता को स्वीकार किया। जबकि भाग-4 के अनुसार लोकसभा हेतु चुना जाने वाला प्रतिनिधि देश के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता हो सकता है।

राज्यों की भागीदारी
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प्रत्येक राज्य की विधान सभा से राज्यसभा की होने वाला निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत आधारित आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के माध्यम से सम्पन्न होता है [अनुच्छेद 80(4)]। संविधान निर्माताओं का निर्णय था कि राज्यसभा की शक्ति राज्यों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में वितरित होगी। उस समय स्वीकृत मापदंड के अनुसार एक राज्य की 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि होगा तथा 50 लाख से ऊपर जाने पर प्रति 20 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि राज्यसभा में भेजा जायेगा। इसी मापदंड के अनुसार विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 1 से 34 के बीच में है। इस प्रावधान द्वारा यह आशा की गई थी कि यह प्रत्येक राज्य में उन अल्पसंख्यकों के निष्पक्ष प्रतिनिधित्व को संभव बनायेगा, जो बहुमत से भिन्न विचार रखते हैं। इसीलिए राज्यसभा राज्य विधान सभाओं से चुनी गयी पार्टियों के विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रतिनिधिक अंश का प्रतिनिधित्व करती है तथा संसदीय स्तर पर राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने का उपकरण बन जाती है।

यह उल्लेखनीय है की संविधान सभा द्वारा इस विचार को अस्वीकृत कर दिया गया था कि राज्यसभा में प्रत्येक राज्य से पांच सदस्य (व्यस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित) भेजे जाने चाहिए। राज्यसभा में सभी राज्यों के समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत इसलिए स्वीकार नहीं किया गया था कि संविधान के निर्माण से पहले भारतीय संघ के राज्य स्वतंत्र सत्ताओं के रूप में (अमेरिका की भांति) नहीं थे। दूसरा कारण भारतीय संघ के राज्यों की विशाल जनसंख्या एवं विस्तृत भू-भाग का होना था।

संविधान निर्माताओं ने राज्य सभा को एक स्थायी सदन के रूप में स्थापित किया है, जिसका विघटन नहीं किया जा सकता। राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष बाद सेवामुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था करने का उद्देश्य सार्वजनिक नीतियों की निरंतरता कायम रखने के अलावा पुराने एवं नये मतों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखना है।

क्या राज्यसभा विधान में बाधक है?
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संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार धन विधेयक के मामले में निम्न सदन (लोकसभा) का विचार मान्य होगा। धन विधेयकों के संबंध में राज्यसभा द्वारा सुझाये गये संशोधनों को मानना या न मानना लोकसभा पर निर्भर है (अनुच्छेद-109)। साथ ही धन विधेयकों या वित्तीय विधेयकों को राज्यसभा द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 109 एवं 117)। अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाला विचार-विमर्श एवं निर्णय केवल लोकसभा में ही होता है।

अन्य सभी विधेयकों के मामले में दोनों सदनों की शक्तियां लगभग समान हैं। गतिरोध की स्थिति को संयुक्त बैठक के माध्यम से दूर किया जाता है (अनुच्छेद-108), हालांकि इन संयुक्त बैठकों में लोकसभा का मत ही प्रभावी रहता है, क्योंकि इसके सदस्यों की संख्या (545) राज्यसभा के सदस्यों की संख्या (250) से अधिक होती है। किंतु, विरोधी दलों के पर्याप्त बहुमत की स्थिति में राज्यसभा विधेयक की विषय-वस्तु में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सकती है। पिछले दो दशकों से अनेक राज्यों में केंद्रीय सत्तारूढ़ दल से भिन्न दलों की सरकारें मौजूद रहीं हैं। इन भिन्न दलों या उनके समूहों द्वारा कुछ निश्चित राज्यों में बहुमत प्राप्त कर लिया जाता हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्यसभा में इनकी शक्ति काफी बढ़ जाती है। यही कारण है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सीटों का प्रतिशत राज्यसभा में, लोकसभा की तुलना में, कम होता है। वास्तव में कई अवसरों पर सत्तारूढ़ दल राज्यसभा में किसी संशोधन विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई मत जुटाने में असमर्थ रहता है। उदाहरणस्वरूप, 1977 एवं 1978 में प्रस्तुत क्रमशः 43वें एवं 44वें संविधान संशोधन विधेयकों का सत्तारूढ़ दल (लोकसभा में बहुमत प्राप्त) तथा मुख्य विपक्षी दल (राज्यसभा में बहुमत प्राप्त) के बीच हुए वृहद् समझौते के अभाव में पारित होना असंभव ही था।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि कड़े विरोध की दशा में राज्यसभा की स्थिति राज्यों की विधान परिषदों की तुलना में पूर्णतः भिन्न है। संसद के दोनों सदनों के बीच पैदा गतिरोध को हटाने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी जाती है जिसमें उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा अंतिम निर्णय किया जाता है। दूसरी ओर राज्य विधान सभा द्वारा दूसरी बार पारित विधेयक को स्वतः ही विधान परिषद द्वारा पारित मान लिया जाता है (अनुच्छेद-197)। साथ ही संसद की अनुमति से विधान सभाएं अपने दो-तिहाई बहुमत तथा कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार विधान परिषद का अवसान कर सकती है। इसके लिए संवैधानिक संशोधन जैसे कानून की आवश्यकता नहीं होती है (अनुच्छेद-169)।

क्या राज्यसभा वास्तव में राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है?
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राज्यसभा मात्र द्वितीयक विचारों का सदन नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों की संरक्षक भी है। अनुच्छेद-249 संसद को राज्य-सूची में शामिल विषयों के संबंध में विधि निर्माण की शक्ति प्रदान करता है, यदि राज्यसभा द्वारा इस आशय का प्रस्ताव (राष्ट्रीय हित में आवश्यक या उचित मानकर) उपस्थित या मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के साथ पारित किया गया है। इस प्रावधान पर विचार-विमर्श के दौरान संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णामचारी दो आधारों पर इससे असहमत थे-

इस विशिष्ट प्रावधान के उल्लंघन की संभावना, तथा;
सभी संघों में केंद्रीय शक्ति संचय की सार्वभौमिक प्रवृति।
उक्त असहमतियों के बावजूद इस प्रावधान को स्वीकार करने का कारण यह था कि संविधान सभा द्वारा राज्यसभा को अनुच्छेद-249 के उल्लंघन का एक विश्वसनीय रोधक मान लिया गया था। जैसा कि कृष्णामचारी द्वारा उद्धृत किया गया है कि केंद्र को राज्यसभा द्वारा अधिकृत किया जायेगा, जिसमें सभी राज्यों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होता है। राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से संसद को विधि निर्माण का अधिकार देना, यह संकेत देता है की राज्य केंद्र द्वारा ग्रहण की गई शक्ति से सहमत है। इससे इस मान्यता की पुष्टि हो जाती है कि राज्यसभा राज्यों की प्रतिनिधि है तथा उनके सामूहिक विचारों को अभिव्यक्त करती है।

यद्यपि सिद्धांत में, अनुच्छेद-249 के अधीन राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव राज्य विधान सभाओं और उनकी सरकारों के दृष्टिकोणों या सहमतियों को प्रतिबिंबित करता है किंतु व्यावहारिक रूप में सदैव ऐसा नहीं होता। अनेक उदाहरणों से पता चलता है कि कई बार राज्यसभा में प्रस्ताव का समर्थन करने वाले बहुमत दल का दृष्टिकोण राज्य सरकारों कको चलने वाले एवं राज्य विधान सभाओं में बहुमत प्राप्त करने वाले दलों से सीधा विरोध रखता है।

इस बात की भी संभावना मौजूद रहती है कि कुछ बड़े राज्य प्रस्ताव या विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की क्षमता रखते हों, जबकि छोटे राज्यों की एक बड़ी संख्या प्रस्ताव के विरुद्ध हो। 1986 में राज्यसभा द्वारा अनुच्छेद 249 के अधीन प्रस्ताव लाने पर कई बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों का मत एक दल या अन्य दलों अथवा छोटे राज्यों में सरकार चलाने वाले दलों द्वारा अप्रभावी बना दिया गया।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के निर्माण के दौरान कई राज्यों द्वारा दो सुझाव प्रस्तुत किये गये- प्रथम, प्रतिनिधित्व का नवीन मापदंड, तथा; दूसरा, राज्यसभा में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व। किंतु, आयोग द्वारा उक्त दोनों सुझाव रद्द कर दिये गये। आयोग का मानना था कि इनमें से कोई भी सुझाव बड़े राज्यों द्वारा कुचले जा रहे छोटे राज्यों के हितों या दृष्टिकोणों के बचाव हेतु अभेद्य सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने में समर्थ नहीं होगा। आयोग द्वारा कहा गया कि सुझाए गए उपचार बीमारी को अधिक गंभीर बना सकते हैं तथा राज्यसभा की मूल भूमिका पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं।

समस्या का मूल राज्यसभा की पुनर्रचना में निहित नहीं है बल्कि इस बात में है कि राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने वाले साधन के रूप में राज्यसभा की विशिष्ट भूमिका को किस प्रकार मजबूत किया जाए। सरकारिया आयोग के अनुसार, ऐसा राज्यसभा द्वारा अपनी आंतरिक कार्यवाही में प्रक्रियात्मक रक्षोपायों को अपनाकर किया जा सकता है। राज्यसभा अपने प्रक्रिया नियमों के द्वारा वास्तविक प्रतिनिधिक अंश की प्रतिबिंबित करने वाली एक विशेष समिति की स्थापना कर सकती है। यह समिति स्वतंत्र एवं खुले विचार-विमर्श द्वारा सदन में विभिन्न दलों के दृष्टिकोणों को सुनिश्चित कर सकती है तथा अनुच्छेद-249 या अनुच्छेद-312 के अधीन प्रस्तुत विधेयकों के बारे में पहले से ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि उक्त विधेयक मात्र सहमति के आधार पर ही पारित किये जायेंगे। यह प्रक्रियात्मक उपाय इन विशेष प्रस्तावों के दुरुपयोग संबंधी आशंकाओं को दूर करने में सफल होगा। यह कुछ बड़े राज्यों (जिनमें केंद्र में सत्तारूढ़ दल का ही शासन है) के व्यापक संख्यात्मक समर्थन के आधार पर केंद्र द्वारा हासिल विधि निर्माण शक्ति को छोटे राज्यों के हितों के प्रतिकूल होने से रोकेगा। यह राज्यसभा की इन विशिष्ट शक्तियों का प्रयोग सहकारी संघवाद के सिद्धांत के अनुकूल होना सुनिश्चित करेगा।

राज्य सभा चुनावों के लिए नए नियम
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अक्टूबर 2003 में नई दिल्ली में सम्पन्न एक सर्वदलीय बैठक में जन-प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 के अंतर्गत राज्य सभा चुनावों के लिए नियमों एवं विनियमों का अनुमोदन किया गया। संशोधित अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार,

1.प्रत्याशियों के लिए निवास संबंधी आवश्यकता का निवारण, तथा;
2.गुप्त मतदान प्रणाली के स्थान पर खुली मतदान व्यवस्था का अंगीकरण किया गया।
नए नियमों एवं विनियमों के अनुसार, राज्य सभा चुनावों में मतदान जहां दो चरणों (Two Tier) में होगा वहीं विधायकों द्वारा मतदान दलगत निर्देशों के अनुसार करना होगा।

अनुच्छेद-81 के अनुसार लोकसभा में राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए 530 से अधिक तथा संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए ऐसी रीति से जो संसद विधि द्वारा उपबंधित करे, चुने गए 20 से अधिक सदस्य नहीं होगे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति अधिक-से-अधिक दो सदस्य नामजद कर सकता है (अनुच्छेद 331)। इस प्रकार, संविधान में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 निश्चित की गई है। अनुच्छेद 81(2) के अनुसार प्रत्येक राज्य की लोकसभा में स्थानों का आबंटन ऐसी रीति से किया जाएगा कि स्थानों की संख्या से उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासाध्य एक ही हो। हालांकि यह धारा लोकसभा में उन राज्यों की स्थान आवंटित करने के संदर्भ में लागू नहीं होती, जिनकी जनसंख्या 6 मिलियन से अधिक नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्य का विभिन्न क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन हेतु प्रत्येक निर्वाचन क्षत्र की जनसंख्या व उसे आबंटित सीटों के मध्य का अनुपात, जो भी अधिक व्यावहारिक व उचित हो, को अपनाना होगा।

82वें अनुच्छेद के अनुसार राज्यों को लोकसभा में सीटों का आबंटन तथा प्रत्येक राज्य की क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन की प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए। यह पुनर्निर्धारण संसद द्वारा निर्मित विधि के अनुरूप किया जाना चाहिए। इस प्रकार, अनुसूचित जातियों व् अनुसूचित जनजातियों के निर्वाचन क्षेत्रों तथा प्रत्येक राज्य में लोकसभा (व राज्य में विधान सभा में) हेतु निर्धारित सीटों की संख्या में परिवर्तन किए बिना निर्वाचन क्षेत्रों का युक्तीकरण व पुनर्समायोजन किया जाना चाहिए।

2002 के 84वें अधिनियम के अनुसार तथा 2003 के सतासीवें संशोधन अधिनियम के पश्चात्,

लोकसभा में राज्यों की सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर रहेगा। महत्वपूर्ण है कि यह आधार वर्ष 2026 के बाद आई पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहेगा।
प्रत्येक राज्य का क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन के पुनर्समायोजन हेतु 2001 के संगणकों को आधार माना जाएगा (84वां संविधान संशोधन 1991 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति प्रदान करता है, जबकि 2003 का 87वां संशोधन 2001 की जनगणना के आधार पर) ।
अवधि

राज्यसभा की अवधि
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संविधान के अनुच्छेद 83(1) के अनुसार, राज्यसभा एक स्थायी सदन है अर्थात् यह कभी भी विघटित नहीं होता। संसद द्वारा निर्मित कानून के अनुसार राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इन सेवानिवृत्त सदस्यों के स्थान पर नये सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इस प्रकार राज्यसभा के सभी सदस्य 6 वर्ष तक अपने पद पर बने रहते हैं।

राज्यसभा के सभापति
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संसद के प्रत्येक सदन का अपना सभापतित्व करने वाला अधिकारी और सचिव तथा अन्य कर्मचारी होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 89 के अनुसार उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। राज्यसभा के सभापति को साधारणतया मत देने का अधिकार नहीं होता है क्योंकि वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है बल्कि उसे यह पद भारत का उप-राष्ट्रपति होने के कारण प्राप्त होता है। परंतु यदि किसी विषय पर पक्ष तथा विपक्ष में डाले गये मतों की गणना एक समान हो तो राज्यसभा के सभापति को निर्णायक मत डालने का अधिकार होता है। राज्यसभा का सभापति वे सभी कार्य करता है जो लोकसभा का अध्यक्ष करता है। अंतर इतना ही है कि लोकसभा अध्यक्ष को संविधान ने कुछ विशेष शक्तियां दी हैं। उदाहरण के लिए, धन विधेयक को प्रमाणित करना या दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन का पीठासीन अधिकारी होना। राज्यसभा अपने सदस्यों में से किसी एक सदस्य को उप-सभापति निर्वाचित करती है।

उल्लेखनीय है कि राज्यसभा के सभापति को वेतन उपराष्ट्रपति के रूप में मिलता है जो वर्तमान में 1.25 लाख रुपए प्रतिमाह निर्धारित किया गया है।

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