Saturday, June 19, 2021

                          मौर्या साम्राज्य         



मौर्य साम्राज्‍य का उदय


मौर्य साम्राज्‍य का प्रारंभ चंद्रगुप्‍त मौर्य द्वारा 321 ईसा पूर्व में मगध से हुआ। विशाखादत्‍त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में चाणक्‍य की मदद से चंद्रगुप्‍त मौर्य के उदय का सुदंरता से चित्रण किया गया है। चंद्रगुप्‍त मौर्य जैनधर्म का अनुयायी था। पाटलिपुत्र, आधुनिक पटना मौर्य साम्राज्‍य की राजधानी थी।

मौर्य साम्राज्‍य का विस्‍तार


मौर्य साम्राज्‍य उस समय के सबसे बड़े साम्राज्‍यों में से एक था और 5,000,000 वर्ग कि.मी से भी अधिक क्षेत्रफल में विस्‍तारित था। उत्‍तर-पूर्व भारत के हिस्‍सों, केरल और तमिलनाडु को छोड़कर मौर्यों ने शेष भारतीय उप-महाद्वीपों पर शासन किया था।



राजव्‍यवस्‍था

मेगस्‍थनीज़ की पुस्‍तक इंडिका और अर्थशास्‍त्र (कौटिल्‍य द्वारा लिखित) के विवरणों में मौर्य प्रशासन, समाज और अर्थव्‍यवस्‍था का विस्‍तृत वर्णन किया गया है।
साम्राज्‍य प्रांतों में विभाजित था, जिसका शासन राजकुमारों के हाथ में था। इसके साथ, 12 विभागों, सैन्‍य बलों में छह शाखाओं का भी उल्‍लेख किया गया है। चंद्रगुप्‍त ने एक सुव्‍यवस्थित प्रशासनिक तंत्र को स्‍थापित किया और एक ठोस वित्‍तीय आधार प्रदान किया।
बिंदुसार (298 – 273 ईसापूर्व)

ग्रीक में इसे अमित्रघात के नाम से जाना जाता था और यह आजीवक सम्‍प्रदाय का अनुयायी था।

अशोक

अशोक 273 ईसापूर्व में सिंहासन पर बैठा और 232 ईसापूर्व तक शासन किया। इसे ‘देवप्रिय प्रियदर्शी’ के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ था, ईश्‍वर का प्‍यारा।
अशोक ने 261 ईसापूर्व में कलिंग का युद्ध लड़ा। कलिंग आधुनिक उड़ीसा में है।
अशोक के शिलालेखों को सबसे पहले जेम्‍स प्रिंसेप ने पढ़ा था।
कलिंग के युद्ध के पश्‍चात, अशोक बौद्ध हो गया, युद्ध के आंतक से विचलित होकर, उसने बेरीघोष की जगह धम्‍मघोष मार्ग अपनाया।
अशोक को बौद्ध धर्म का ज्ञान बुद्ध के एक शिष्‍य उपगुप्‍त या निग्रोध ने दिया था।
बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्ममहामात्रों को नियुक्‍त किया।
अशोक के शिलालेख

अशोक के शिलालेखों में राज आज्ञा थी जिसके जरिए वह जनता से सीधे संपर्क करने में सक्षम था। ये शिलालेख और स्‍तंभलेख थे जिन्‍हें दीर्घ और लघु में बांटा गया था।
अशोक के 14 मुख्‍य शिलालेख धर्म सिद्धांत के बारे में बताते हैं।
कलिंग शिलालेख कलिंग युद्ध के बाद प्रशासन के सिद्धांत की व्‍याख्‍या करता है। अपने कलिंग शिलालेख में, इसने जिक्र किया है ‘सभी मनुष्‍य मेरे बच्‍चे हैं’।
अशोक के मुख्‍य शिलालेख XII में कलिंग युद्ध का जिक्र किया गया है।
‘अशोक’ का सर्वप्रथम उल्‍लेख केवल मास्‍की लघु शिलालेख में हुआ है।
अशोक और बौद्ध धर्म

अशोक ने 250 ईसापूर्व में अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में मोगलीपुत्‍त तिस्‍स की अध्‍यक्षता में तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन किया।
उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्‍द्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।
अशोक ने श्रीलंका और नेपाल में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसे बौद्ध धर्म के कोंसटेटाइन कहा जाता है।
श्रीलंका के शासक देवमप्रिय तिस्‍स अशोक के प्रथम बौद्ध धर्म धर्मांतरण थे।
अशोक की धम्‍म नीति का व्‍यापक उद्देश्‍य सामाजिक व्‍यवस्‍था को बनाए रखना था।
अशोक ने 40 वर्षों तक शासन किया और 232 ईसापूर्व में इसकी मृत्‍यु हो गई।
मौर्य प्रशासन

अत्‍यधिक केन्‍द्रीयकृत प्रशासनिक ढांचा। चाणक्‍य ने प्रशासन में सप्‍तांग सिद्धांत के 7 तत्‍वों का जिक्र किया है। राजा को मंत्रिपरिषद द्वारा सलाह दी जाती थी। विभिन्‍न प्रशासनिक क्रियाकलापों के लिए महत्‍वपूर्ण अधिकारी नियुक्‍त किए जाते थे।

प्रशासन चार इकाईयों में विभाजित था

चक्र या प्रांत
अहर या जिला
संघ्राहाना या गांवों का समूह
गांव
नगरीय प्रशासन के अध्‍यक्षता करने वाले नगरक का उल्‍लेख अर्थशास्‍त्र में भी पाया जाता था।

मौर्य कला

1) शाही कला – राजमहल, स्‍तंभ, गुफाएं, स्‍तूप आदि

2) लोकप्रिय कला – चित्रण मूर्तियां, टेराकोटा वस्‍तुएं आदि

भारतीय गणराज्‍य के प्रतीक को अशोक स्‍तंभ के चार शेरों से लिया गया है, जो सारनाथ में स्थित है। सांची से अन्‍य चार शेर, रामपुरवा और लौरिया नन्‍दनगढ़ से एक शेर और रामपुरवा से एक बैल और धौली में नक्‍काशीदार हाथी पाए जाते हैं।

मौर्यों ने व्‍यापक स्‍तर पर पत्‍थर राजगिरी की शुरुआत की थी। इन्‍होंने चट्टानों को खोदकर गुफाएं बनाने की शुरूआत की और बुद्ध और बोधिसत्‍व के पुरावशेष संग्रहित करने के लिए स्‍तूपों का निर्माण किया जिसका बाद में गुप्‍त वंश द्वारा विस्‍तार किया गया था।

पतन का कारण

अत्‍यधिक केन्‍द्रीयकृत मौर्य प्रशासन
अशोक की मृत्‍यु के बाद विभाजन ने साम्राज्‍य की एकता में फूट डाल दी
उत्‍तरवर्ती कमजोर मौर्य शासक भी इस साम्राज्‍य के पतन के कारण थे|

Tuesday, April 21, 2020

National Civil Services Day

21 अप्रैल
National_Civil_Service_Day 

इस दिन, ‘लोक प्रशासन में विशिष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार’ (Prime Minister's Awards for Excellence in Public Administration) प्रदान किये जाते हैं. पुरस्कार स्कीम में, देश भर में बड़ी संख्या में जिले भाग लेते हैं और काफी बड़े पैमाने पर इसका आयोजन किया जाता है. 

सिविल सर्विस वह सेवा है जो देश की सरकार के सार्वजनिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार है. इसमें विधायी, न्यायपालिका और सैन्य कर्मी शामिल नहीं होते हैं. आपको बता दें कि सिविल सेवा के सदस्य किसी भी राजनीतिक सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कोई प्रतिज्ञा नहीं लेते हैं, लेकिन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की नीतियों के निष्पादक होते हैं.

सिविल सेवा (Civil Service) शब्द ब्रिटिश काल में आया था जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नागरिक कर्मचारी प्रशासनिक नौकरियों में शामिल थे और उन्हें 'लोक सेवक' के रूप में जाना जाता था. इसकी नींव वॉरेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) द्वारा रखी गई और बाद में चार्ल्स कॉर्नवॉलिस (Charles Cornwallis) द्वारा और अधिक सुधार किए गए, इसलिए उन्हें "भारत में नागरिक सेवाओं के पिता" ("Father of Civil Services in India") के रूप में जाना जाता था.

भारत में सिविल सेवा में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS), भारतीय विदेश सेवा (IFS) और अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवा समूह A और समूह B की व्यापक सूची शामिल है. 21 अप्रैल सिविल सेवा को समर्पित है. लोग अपनी अनुकरणीय सेवाओं की स्मृति में और जो उन्होंने वर्षों पहले किया है उसे वापस प्रतिबिंबित करने के लिए इस दिन को मनाते हैं. इसके अलावा, इस दिन वे आने वाले वर्ष के लिए योजना बनाते हैं कि उन्हें अपने संबंधित विभागों के लिए कैसे काम करना है.

इसकी उत्पत्ति 1947 वर्ष से संबंधित है जब 21 अप्रैल को सरदार वल्लभ भाई पटेल, गृह सदस्य, संसद ने अखिल भारतीय सेवाओं का उद्घाटन किया था. दिल्ली के मेटकाफ हाउस में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण स्कूल में परिवीक्षाधीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए, उन्होंने एक शक्तिशाली भाषण दिया और सिविल सेवकों को अतीत के अनुभव को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रीय सेवा की सच्ची भूमिका को अपनाने का अधिकार दिया. अपने भाषण में उन्होंने सिविल सेवकों को 'भारत का स्टील फ्रेम' कहा. इस तरह का पहला समारोह 21 अप्रैल, 2006 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया गया था. इसलिए, 2006 से इसे 21 अप्रैल को राष्ट्रीय नागरिक सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन लोक प्रशासन में विशिष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार भी दिए जाते हैं.

राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाने का उद्देश्य

- सिविल सेवा अधिकारियों के कार्य और प्रयासों को प्रेरित करना और उनकी सराहना करना.

- केंद्र सरकार इस अवसर का उपयोग सिविल सेवाओं के तहत विभिन्न विभागों के काम का मूल्यांकन करने के लिए करती है.

- केंद्र सरकार सबसे अच्छा काम करने वाले व्यक्तियों और समूहों को पुरस्कार देती है.

- इस दिन ज्यादातर केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में उनकी असाधारण सेवाओं के लिए सम्मानित किया जाता है. क्या आप जानते हैं कि यह समारोह Department of the Administrative Reforms and Public grievances (DARPG) and Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions द्वारा आयोजित किया जाता है?

हर साल लाखों उम्मीदवार भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं. इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि सिविल सेवा वह स्तंभ है, जिस पर सरकार देश की नीतियों और कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाती है. सिविल सेवकों के योगदान को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है. इसलिए, 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि राष्ट्र के लिए उनके अपार योगदान के लिए सिविल सेवकों को प्रोत्साहित किया जा सके.

Monday, April 20, 2020

संथाल विद्रोह .....✍


*संथाल विद्रोह*

.....…..............

संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों – मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला.

वर्ष 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था। इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला

 आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.

विद्रोह के कारण
..........
 
1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने इन पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। तदोपरांत, 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति प्रस्तावित की जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था और बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। लेकिन बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।

जब शांति स्थापना के लिए अभियान चल रहे थे तभी पहाड़िया लोग अपने आपको शत्रुतापूर्ण सैन्यबलों से बचाने के लिए और बाहरी लोगों से लड़ाई चालू रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। इसलिए जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तो यह स्वाभाविक ही था कि पहाड़िया लोग बुकानन को संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखते। शांति स्थापना के अभियानों के अनुभव और क्रूरतापूर्ण दमन की यादों के कारण उनके मन में यह धारणा बन गई थी कि उनके इलाको ब्रिटिश लोगो की घुसपैठ का क्या असर होने वाला है उन्हे ऐसे प्रतीत होता था कि प्रत्येक गोरा आदमी एक ऐसी शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो उनसे उनके जंगल और जमीन छीन कर उनकी जीवन शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू हैं। वस्तुत: इन्हीं दिनों उन्हें एक नए खतरे की सूचनाएँ मिलने लगी थीं और वह था संथाल लोगों का आगमन।

संथाल लोग वहाँ के जंगलों का सफ़ाया करते हुए, इमारती लकड़ी को काटते हुए, जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास उगाते हुए उस इलाको में बड़ी संख्या में घुसे चले आ रहे थे। चूँकि संथाल बाशिंदों ने निचली पहाड़ियों पर अपना कब्जा जमा लिया था, इसलिए पहाड़ियों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा। पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे इसलिए यदि कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को नए बाशिंदों ;संथालों की शक्ति का प्रतिनिधि मानना होगा। हल और कुदाल के बीच की यह लड़ाई बहुत लंबी चली।

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को “दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

संथाल विद्रोह ब्रिटिश शासनकाल में ज़मींदारों तथा साहूकारों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ किया गया था। आदिवासियों के विद्रोहों में संथालों का यह सबसे सशक्त विद्रोह था।

भागलपुर से राजमहल के बीच का क्षेत्र 'दामन-ए-कोल' के नाम से जाना जाता था। यह विशेष रूप से संथाल बहुल क्षेत्र था। यहाँ के हज़ारों संथालों ने गैर-आदिवासियों को भगाने और उनकी सत्ता समाप्त कर अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए जोरदार संघर्ष छेड़ा।

विद्रोह भूमिकर अधिकारियों द्वारा किये जाने वाले दुर्व्यवहार तथा ज़मींदार, साहूकार आदि द्वारा किये जाने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ किया गया था।
संथाल विद्रोह आर्थिक कारणों से बिहार और उड़ीसा के वीरभूम, सिंहभूम, बांकुड़ा, मुंगेर, हज़ारीबाग़ और भागलपुर के ज़िले में हुआ था।

विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता
..........
1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे – सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सिद्धू  ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा  करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् “ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.

 
जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.

संथाल विद्रोह का दमन
.................
ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.

अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.

संथाल विद्रोह का महत्त्व
..............
भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए।
                 Diwakar Kumar Thakur 

Sunday, April 19, 2020

सिकंदर का भारत अभियान......✍

सिकंदर का भारत अभियान
............................

●सिकंदर यूनान के मेसिडोनिया का शासक था और  उसके पिता का नाम फिलिप द्वितीय था।
●सिकंदर विश्वविजय की महत्वाकांक्षा रखता था अपनी इस महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए उसने भारत पर 326-27 ई.पू. में भारत पर आक्रमण किया।
●सिकंदर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर भारत अनेक छोटे छोटे राज्योँ मेँ विभक्त था, जिसमे कुछ कुछ राजतंत्रात्मक तथा कुछ गणराज्य थे।
●भारत मेँ सर्वप्रथम सिकंदर का सामना तक्षशिला के शासक अम्भी से हुआ। अम्भी ने शीघ्र ही समर्पण कर दिया और सिकंदर को सहायता का वचन दिया।
●सिकंदर का भारत मेँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण युद्ध झेलम नदी के तट पर पुरु या पोरस के साथ हुआ जिसे पितस्ता का युद्ध कहा जाता है।
●इस युद्ध को ‘हाइडेस्पेस का युद्ध’ भी कहा गया है। इस युद्ध में पोरस की हार हुई, लेकिन सिकंदर ने पोरस की बहादुरी से प्रभावित होकर उसका राज्य वापस कर दिया।
●पोरस की हार के बाद सिकंदर ने ‘गलॅागनिकाय’ तथा कुछ जातियो को भी पराजित किया।
●सिकंदर ने भारत मेँ दो नगरो की स्थापना की। पहला नगर ‘निकैया’ (विजय नगर) विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य मेँ तथा दूसरा अपने प्रिय घोड़े के नाम पर बुकफेला रखा।
●सिकंदर की सेना ने व्यास नदी से आगे बढने से इंकार कर दिया। सिकंदर ने सैनिकोँ मेँ जोश भरने का पूरा प्रयत्न किया किन्तु उसे इस कार्य में सफलता नहीँ मिली।
●सैनिकों के हठ के सामने सिकंदर अंततः सिकंदर को अपने भारत विजय के अभियान को रोकना पड़ा।
●सिकंदर ने विजित भारतीय प्रदेशोँ को अपने सेनापति फिलिप को सौंप कर वापस लौटने का निर्णय किया। सिकंदर भारत मेँ 19 महीने रहा।
●कहा जाता है की सिकंदर के लगातार युद्धों, घर परिवार की याद, भारत की गर्म जलवायु आदि ने उसकी सेना के हौसले पस्त कर दिए।
●सिकंदर भारत के शक्तिशाली मगध साम्राज्य पर आक्रमण करना चाहता था। लेकिन जब उसकी सेना ने मगध की विशाल सेना के बारे मेँ सुना तो वह घबरा उठी।
●सिकंदर ने भारत के आक्रमण के समय मगध एक शक्तिशाली राज्य था, जिस पर घनानंद नामक राजा का शासन था। घनानंद की सेना मेँ लगभग 6 लाख सैनिक थे।
●अपने देश मेसिडोनिया लौटते समय लगभग 323 ई.पू. में बेबीलोन में सिकंदर का निधन हो गया।

सिकंदर के भारत अभियान का प्रभाव
.......................
1.सिकंदर की विश्व विजय की महत्वाकांक्षा ने उसे भारत विजय के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा अथवा सिकंदर के भारत अभियान ने प्राचीन यूरोप को, प्राचीन भारत के निकट संपर्क मेँ आने का अवसर प्रदान किया।
सिकंदर के इस भारत अभियान का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 2.था- भारत और यूनान के बीच विभिन्न क्षेत्रों मेँ प्रत्यक्ष संपर्क की स्थापना।
3.राय चौधरी के अनुसार सिकंदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप भारत की छोटी छोटी रियासतें समाप्त हो गईं।
डॉ राधा कुमुद मुखर्जी के अनुसार सिकंदर के भारत पर आक्रमण से राजनीतिक एकीकरण को प्रोत्साहन मिला, जिससे छोटे राज्य बड़े राज्यों में विलीन हो गए।
4.कला के क्षेत्र में गांधार शैली का भारत मेँ विकास यूनानी प्रभाव का ही परिणाम है।
6.यूनानियों की मुद्रण निर्माण कला का प्रभाव भारतीय मुद्रा कला पर दृष्टिगत होता है। उलूक शैली के सिक्के इसके उदाहरण हैं।
7.व्यापार के क्षेत्र मेँ पश्चिम के देशो के साथ जल मार्गों का पता चला, जिनका कालांतर में व्यापार पर अनुकूल प्रभाव पड़ा।

20 अप्रैल का इतिहास ....✍

23 अप्रैल का इतिहास ........✍

20 अप्रैल का इतिहास: आज के दिन हुआ था हिटलर का जन्म, अमेरिका में दो छात्रों ने मिनटों में ली 25 लोगों की जान......✍
देश दुनिया के इतिहास में 20 अप्रैल की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-
1592: अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि जॉन इलियट का जन्म।
1611: विख्यात उपन्यासकार विलियम शैक्सपियर के नाटक 'मैकबेथ'' का पहला ज्ञात मंचन हुआ।
1712 : जहांदार शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इस मुगल सम्राट ने 1713 तक शासन किया। वह बहादुरशाह का बड़ा पुत्र था।
1889 : जर्मन तानाशाह अडोल्फ हिटलर का जन्म।
1946: संयुक्त राष्ट्र की पूर्ववर्ती संस्था लीग ऑफ नेशन्स भंग की गई।
1953 : कोरिया और संयुक्त राष्टृ सेना के बीच बीमार युद्ध बंदियों का आदान प्रदान हुआ। रिहा किए गए 100 संयुक्त राष्टृ सैनिकों में ब्रिटेन के 12, अमेरिका के 30, दक्षिण कोरिया के 50 और कुछ अन्य देशों के सैनिक थे।
1960 : एयर इंडिया ने लंदन की अपनी पहली बोइंग 707 उड़ान के साथ जेट युग में प्रवेश किया।
1972: अपोलो 16 अंतरिक्ष यान छह घंटे तक इंजन की समस्या से प्रभावित रहने के बाद आखिरकार चंद्रमा पर उतरा।
1974 : सत्तर के दशक में आँतरिक हिंसा से बुरी तरह प्रभावित उत्तरी आयरलैंड के संघर्ष में मरने वालों की संख्या 1000 पहुँची।
1997: इंद्र कुमार गुजराल देश के 12वें प्रधानमंत्री बने।
1999 : अमेरिका के डेनवर शहर के एक स्कूल में दो छात्रों ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर 25 लोगों की जान ले ली। घटना में 15 अन्य लोग घायल हुए।
2010 : मैक्सिको की खाड़ी में स्थित गहरे पानी के तेल भंडार में विस्फोट से इतिहास का सबसे बड़ा तेल रिसाव हुआ।
2011 : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह प्रक्षेपण यान 'पीएसएलवी' ने तीन उपग्रहों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया।

PCS परीक्षा की तैयारी कैसे करें ...✍

उनलोगो के लिए जो अभी पीसीएस परीक्षा में सम्मिलित होने के इच्छुक है
मेरी तरफ से कुछ सुझाव --
1-पहली बात कि आप सर्वप्रथम पीसीएस प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा का
सिलेबस ले लीजिये । उसे दो चार बार बस पढ़ जाइए ताकि कम से कम आपको
सिलेबस याद तो रहे क्योंकि यही आगे आपको बताएगा कि क्या पढ़ना चाहिए
और क्या नहीं ।
2-दूसरी बात ये कि जब आप इस क्षेत्र में प्रविष्ट हो रहे है तो अन्यजगहों का
मोह माया त्याग दीजिये क्योंकि आप को शीघ्र अतिशीघ्र सफल होना है ।मन में
हमेशा यही गूँजना चाहिए कि बस अब आप को करना है , करना है ,करना है और
करना ही है ।
3-तीसरी बात कि आपको अब शुरू कहा से करना है चूँकि आपको अभी ए बी सी
डी भी नहीं आती है इसलिए आपका प्रारंभिक रास्ता सही होना चाहिए क्योंकि
यह काफी महत्वपूर्ण होता है । घबराने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है
क्योंकि जब मैं तैयारी में आया था तो उसवक्त मुझे भी कुछ नहीं आता था ये
सबके साथ होता है कोई माँ के पेट से सब कुछ सिख के नहीं आता अतः अज्ञात
भय निकाल के ध्यान से बात सुने
क-) A-4 शीट एक बण्डल ले लो क्योंकि मेरी रणनीति में लिखना अपरिहार्य
शर्त है । या फिर ब्लेंक कॉपी यानि बिना लाइन खींची हुई । काला ,नीला ,लाल
और हरा कलम का भी उचित प्रबंधन कीजिये ।
ख-) कुछ बुक्स लीजिय
आवश्यक
___________________________________
परिक्षावाणी की समस्त श्रृंखला
घटनाचक्र की समस्त श्रृंखला
__________________________________
इतिहास -
कक- युथ कॉम्पिटिशन की बुक जिसमे समस्त वर्षों के प्रश्न हल समाहित हो
कख- किरण पौब्लिकेशन की बुक जिसका कवर लाल रंग का है (वो ही ले जिन्हें
खुद के रटने की क्षमता पे भरोसा हो )
कग-आधुनिक भारत के इतिहास -स्पेक्ट्रम
कघ-घटनाचक्र इससे विगत वर्षों के प्रश्न को देखने से एक अनुमान विकसित
होता है कि आगामी प्रश्न कैसे होंगे ।
___वाकी मेरे नोट्स से आपको थोड़ी बहुत सहायता मिलेगी ।
_________________________
भूगोल
कक- वर्णवाल की
कख- एक एटलस( बाजार में जाके देखियेगा )
परीक्षा मंथन भारत व् विश्व दोनों
_____________________________
राजव्यवस्था -
कक-परीक्षा मंथन
परीक्षा वाणी
______________________________
अर्थशास्त्र
प्रतियोगिता दर्पण विशेषांक (पतली वाली)
परीक्षा वाणी
_______________________________
उत्तर प्रदेश विशेष
कक-परीक्षा मंथन
कख-परीक्षा वाणी
कग-मेरे नोट्स
________________________________
पर्यावरण व् पारिस्थितिकीय
कक-परीक्षा मंथन
कख-परीक्षा वाणी
_________________________________
विज्ञान
कक-NCERT
कख-लुसेंट
_________________________________
कृषि
कक-घटनाचक्र
कख-परीक्षा वाणी
कग- मेरे नोट्स
__________________________________
समसामयिकी
कक- nirdeshak (mobile app) आप प्ले स्टोर पे जाइए वहा से इंस्टॉल
कीजिये ।
कख-online tyari (mobile app)आप प्ले स्टोर पे जाइए वहा से इंस्टॉल
कीजिये ।
कग- gs hindi (facebook page) अपने फेसबुक से सर्च कीजिये और
इस पेज को लाइक कीजिये
कघ- दैनिक समसामायिकी (फेसबुक पेज है )
कच-कोई एक पत्रिका जैसे क्रोनिकल या प्रतियोगिता दर्पण या दृष्टि या
घटना चक्र ।
______________________________________
निबंध
कक-स्पेक्ट्रम
कख- समाचार पत्र
लिखने का अभ्यास
______________________________________
शुरुआत कैसे करे --)
1-आप उस विषय को उठाइये जिसमे आपकी सबसे ज्यादा रूचि हो जैसे कुछ
लोग विज्ञान पढ़ना पसंद करते है तो कुछ लोग भूगोल तो कुछ लोग संविधान
ओके ।
2-अगर आप निर्णय नहीं ले पा रहे है तो कोई बात नहीं आप पहले संविधान और
इतिहास उठाइये और कुछ दिन सिर्फ उसे ऐसे ही देखिये । दो चार दिन बाद धीरे
धीरे आप को समझ में थोड़ा बहुत आने लगेगा । पहला चैप्टर उठाइये फिर - जैसे
उद्देशिका इसको दो बार पढ़िए तीन बार पढ़िए चार लड़िये फिर इससे सम्बंधित
प्रश्न देखिये कि कैसे पूछे गए है ।परिक्षावाणी की बुक में एक चैप्टर के बाद
उससे सम्बंधित प्रश्न दिए गए है ।
इसी तरह इतिहास का काम कीजिये जो न समझ में आये उसे रट लीजिये और कई
बार पढ़िए ध्यान रखिये पिछले वर्ष के प्रश्न जरूर देखिये ।
3- जो आपके निकटम हो उसके संपर्क में रहिये जो न समझ में आय उनसे पूछिये
याद रखिये आज भी दुनिया में बहुत अच्छे अच्छे लोग है वो आपको निःसंदेह सही
राय देंगे ।
4- चूँकि कुछ लोग पहले ncert पढ़ रहे है तो येभी अच्छी बात है उसमे से जो
प्रश्न आपको सही लगे उसे अपने नोट्स पे लिख लीजिये । सब कुछ लिख के याद
कीजिये अगर ऐसे नहीं याद हो रहा है तो ।
5-तैयारी अनवरत रखिये अक्सर मैं देखता हु कि लोग बेवजह समय बर्बाद
करते है जैसे दोपहर में खाके सोना (इलाहाबादी मित्रलोग अग्रणी है ) हर
शुक्रबार को मूवी देखना वगैरह वगैरह इन सब से बचिए थोडा ।कुछ लोग तैयारी
केदौरान रिश्ते नाते भी खूब निभाते है गर्मी में मामा के यहाँ चले गए शादी में जहाँ
2 दिन के लिए जाना चाहिए वह 10 दिन के लिए चले गए इन सब से भी बचिए
रिश्ते जो दिल के होते है वो जाने आने से नहीं बनते बिगड़ते ।
6- पीसीएस या जो भी बनना है उसके प्रति एक जूनून पैदा कीजिये रात हो
दोपहर हो या सुबह हो आपके सामने बस आपका लक्ष्य होना चाहिए बस करना
है तो करना है ।
_______________________________________________
ये सब प्रारंभिक की रणनीति है ।
मुख्य परीक्षा के लिए आपको एक विषय चुनने है बस आपको जो सही लगे ले।
रोज एक एक प्रश्न हल कीजिये बस ख़त्म ।
________________________________________________
याद रखिये ये एग्जाम एक जंग है अंत तक टिके रहने वाला ही जीत हासिल कर
सकता है अतः पूरी ईमानदारी से लगिए सफलता निश्चित है ।


Saturday, April 18, 2020

बिरसा मुंडा आंदोलन ✍

बिरसा मुंडा आन्दोलन 
BPSC
................................

1857 ई. के बाद मुंडाओं ने सरदार आन्दोलन चलाया जो एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था. पर इससे आदिवासियों की स्थिति में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया. मुंडाओं ने आगामी आन्दोलन को उग्र रूप देने का निर्णय लिया. सरदार आन्दोलन के ठीक विपरीत बिरसा मुंडा आन्दोलन उग्र और हिंसक था. इस आन्दोलन के नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda), एक पढ़े-लिखे युवा नेता थे. यह आन्दोलन विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू किया गया था. इसलिए इसका स्वरूप भी मिश्रित था. यह आन्दोलन आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन और धार्मिक पुनरुत्थान जैसे विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने की इच्छा रखता था.
 चलिए पढ़ते हैं बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) के उद्देश्य, नेतृत्वकर्ता और परिणाम के बारे में – –

बिरसा मुंडा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य
...................….............................

बिरसा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य था दिकू जमींदारों (गैर-आदिवासी जमींदार) द्वारा हथियाए गए आदिवासियों की कर मुक्त भूमि की वापसी जिसके लिए आदिवासी लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे. मुंडा समुदाय सरकार से न्याय पाने में असमर्थ रहे. इस असमर्थता से तंग आ कर उन्होंने अंग्रेजी राज को समाप्त करने और मुंडा राज की स्थापना करने का निर्णय लिया. वे सभी ब्रिटिश अधिकारीयों और ईसाई मिशनों को अपने क्षेत्र से बाहर निकाल देना चाहते थे. बिरसा मुंडा ने एक नए धर्म का सहारा लेकर मुंडाओं को संगठित किया. उनके नेतृत्व में मुंडाओं ने 1899-1900 ई. में विद्रोह किया.

बिरसा मुंडा का नेतृत्व
..............................
बिरसा मुंडा आदिवासियों की दयनीय हालत को देखकर उन्हें जमींदारों और ठेकेदारों के अत्याचार से मुक्ति दिलाना चाहते थे. बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ने अनुभव किया था कि शांतिपूर्ण तरीकों से आन्दोलन चलाने का परिणाम व्यर्थ होता है. इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन को उग्र बनाने के लिए अधिक से अधिक नवयुवकों को संगठित किया. मुंडाओं ने उन्हें अपना भगवान् मान लिया. उनका प्रत्येक शब्द मुंडाओं के लिए मानो ब्रह्मवाक्य बन गया. बिरसा मुंडा ने घोषणा की कि कोई भी सरकार को कर नहीं दे. मुंडाओं ने उनकी बातें मानी और पालन किया.

बिरसा मुंडा गिरफ्तार
.............................

1895 ई. में बिरसा मुंडा को विद्रोह फैलाने और राजविरोधी षड्यंत्र करने के अपराध में गिरफ्तार कर  लिया गया. उन्हें दो वर्ष की कैद की सजा मिली. जेल से रिहा होने के बाद वह और भी सक्रिय होकर और अधिक गर्मजोशी से आदिवासी युवाओं को आन्दोलन के लिए प्रेरित करने लगे. जंगल में छिपकर गुप्त सभाएँ आयोजित की जाती थीं और सभी को आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता था. वे स्वयं महारानी विक्टोरिया के पुतले पर तीरों से वार करके तीरंदाजी का अभ्यास करते थे. बिरसा मुंडा आन्दोलन में कई निर्दोष लोगों की भी हत्या हुई जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे सरकारी नौकर थे.

 
विद्रोह का दमन
.....................

1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुंडाओं का व्यापक और हिंसक विद्रोह शुरू हुआ. सबसे पहले जो मुंडा ईसाई बने थे और जो लोग सरकार के लिए काम करते थे, उन्हें मारने का प्रयास किया गया लेकिन बाद में इस नीति में परिवर्तन किया गया क्योंकि अपना धर्म बदलने वाले मुंडा थे तो अपने ही समुदाय के! इसलिए उन्हें छोड़ सरकार और मिशनरियों के विरुद्ध आवाज़ उठने लगी. राँची और सिंहभूम में अनेक चर्चों में मुंडा आदिवासी समूह ने आक्रमण किया. पुलिस मुंडाओं के क्रोध का विशेष शिकार बनी. इस विद्रोह का प्रभाव पूरे छोटानागपुर में फ़ैल गया.

चिंतित होकर सरकार ने इस विद्रोह का दमन करने का निर्णय लिया. सरकार ने पुलिस और सेना की सहायता ली. मुंडाओं ने छापामार युद्ध का सहारा लेकर पुलिस और सेना का सामना किया लेकिन बन्दूक के सामने तीर-धनुष कब तक टिकती? फरवरी 1900 ई. में बिरसा एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें राँची के जेल में रखा गया. उनपर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया. मुक़दमे के दौरान ही बिरसा मुंडा को हैजा हो गया और 9 जून, 1900 ई. को उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया.

परिणाम
...............
बिरसा की मृत्यु के बाद बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) शिथिल पड़ गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी की सजा दी गई. अनेक मुंडाओं को जेल में ठूस दिया गया. परिणामस्वरूप बिरसा मुंडा आन्दोलन विफल हो गया. आदिवासियों को इस आन्दोलन से तत्काल कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ परन्तु सरकार को उनकी गंभीर स्थिति पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा. आदिवासियों की जमीन का सर्वे करवाया गया. 1908 ई. में  ही छोटानागपुर काश्तकारी कानून (Chotanagpur Tenancy Act, 1908) पारित हुआ. मुंडाओं को जमीन सम्बंधित कई अधिकार मिले और बेकारी से उन्हें मुक्ति मिली. मुंडा समुदाय आज भी बिरसा को अपना भगवान् मानता है.