Tuesday, April 21, 2020

National Civil Services Day

21 अप्रैल
National_Civil_Service_Day 

इस दिन, ‘लोक प्रशासन में विशिष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार’ (Prime Minister's Awards for Excellence in Public Administration) प्रदान किये जाते हैं. पुरस्कार स्कीम में, देश भर में बड़ी संख्या में जिले भाग लेते हैं और काफी बड़े पैमाने पर इसका आयोजन किया जाता है. 

सिविल सर्विस वह सेवा है जो देश की सरकार के सार्वजनिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार है. इसमें विधायी, न्यायपालिका और सैन्य कर्मी शामिल नहीं होते हैं. आपको बता दें कि सिविल सेवा के सदस्य किसी भी राजनीतिक सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कोई प्रतिज्ञा नहीं लेते हैं, लेकिन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की नीतियों के निष्पादक होते हैं.

सिविल सेवा (Civil Service) शब्द ब्रिटिश काल में आया था जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नागरिक कर्मचारी प्रशासनिक नौकरियों में शामिल थे और उन्हें 'लोक सेवक' के रूप में जाना जाता था. इसकी नींव वॉरेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) द्वारा रखी गई और बाद में चार्ल्स कॉर्नवॉलिस (Charles Cornwallis) द्वारा और अधिक सुधार किए गए, इसलिए उन्हें "भारत में नागरिक सेवाओं के पिता" ("Father of Civil Services in India") के रूप में जाना जाता था.

भारत में सिविल सेवा में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS), भारतीय विदेश सेवा (IFS) और अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवा समूह A और समूह B की व्यापक सूची शामिल है. 21 अप्रैल सिविल सेवा को समर्पित है. लोग अपनी अनुकरणीय सेवाओं की स्मृति में और जो उन्होंने वर्षों पहले किया है उसे वापस प्रतिबिंबित करने के लिए इस दिन को मनाते हैं. इसके अलावा, इस दिन वे आने वाले वर्ष के लिए योजना बनाते हैं कि उन्हें अपने संबंधित विभागों के लिए कैसे काम करना है.

इसकी उत्पत्ति 1947 वर्ष से संबंधित है जब 21 अप्रैल को सरदार वल्लभ भाई पटेल, गृह सदस्य, संसद ने अखिल भारतीय सेवाओं का उद्घाटन किया था. दिल्ली के मेटकाफ हाउस में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण स्कूल में परिवीक्षाधीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए, उन्होंने एक शक्तिशाली भाषण दिया और सिविल सेवकों को अतीत के अनुभव को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रीय सेवा की सच्ची भूमिका को अपनाने का अधिकार दिया. अपने भाषण में उन्होंने सिविल सेवकों को 'भारत का स्टील फ्रेम' कहा. इस तरह का पहला समारोह 21 अप्रैल, 2006 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया गया था. इसलिए, 2006 से इसे 21 अप्रैल को राष्ट्रीय नागरिक सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन लोक प्रशासन में विशिष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार भी दिए जाते हैं.

राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाने का उद्देश्य

- सिविल सेवा अधिकारियों के कार्य और प्रयासों को प्रेरित करना और उनकी सराहना करना.

- केंद्र सरकार इस अवसर का उपयोग सिविल सेवाओं के तहत विभिन्न विभागों के काम का मूल्यांकन करने के लिए करती है.

- केंद्र सरकार सबसे अच्छा काम करने वाले व्यक्तियों और समूहों को पुरस्कार देती है.

- इस दिन ज्यादातर केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में उनकी असाधारण सेवाओं के लिए सम्मानित किया जाता है. क्या आप जानते हैं कि यह समारोह Department of the Administrative Reforms and Public grievances (DARPG) and Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions द्वारा आयोजित किया जाता है?

हर साल लाखों उम्मीदवार भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं. इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि सिविल सेवा वह स्तंभ है, जिस पर सरकार देश की नीतियों और कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाती है. सिविल सेवकों के योगदान को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है. इसलिए, 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि राष्ट्र के लिए उनके अपार योगदान के लिए सिविल सेवकों को प्रोत्साहित किया जा सके.

Monday, April 20, 2020

संथाल विद्रोह .....✍


*संथाल विद्रोह*

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संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों – मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला.

वर्ष 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था। इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला

 आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.

विद्रोह के कारण
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1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने इन पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। तदोपरांत, 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति प्रस्तावित की जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था और बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। लेकिन बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।

जब शांति स्थापना के लिए अभियान चल रहे थे तभी पहाड़िया लोग अपने आपको शत्रुतापूर्ण सैन्यबलों से बचाने के लिए और बाहरी लोगों से लड़ाई चालू रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। इसलिए जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तो यह स्वाभाविक ही था कि पहाड़िया लोग बुकानन को संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखते। शांति स्थापना के अभियानों के अनुभव और क्रूरतापूर्ण दमन की यादों के कारण उनके मन में यह धारणा बन गई थी कि उनके इलाको ब्रिटिश लोगो की घुसपैठ का क्या असर होने वाला है उन्हे ऐसे प्रतीत होता था कि प्रत्येक गोरा आदमी एक ऐसी शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो उनसे उनके जंगल और जमीन छीन कर उनकी जीवन शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू हैं। वस्तुत: इन्हीं दिनों उन्हें एक नए खतरे की सूचनाएँ मिलने लगी थीं और वह था संथाल लोगों का आगमन।

संथाल लोग वहाँ के जंगलों का सफ़ाया करते हुए, इमारती लकड़ी को काटते हुए, जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास उगाते हुए उस इलाको में बड़ी संख्या में घुसे चले आ रहे थे। चूँकि संथाल बाशिंदों ने निचली पहाड़ियों पर अपना कब्जा जमा लिया था, इसलिए पहाड़ियों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा। पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे इसलिए यदि कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को नए बाशिंदों ;संथालों की शक्ति का प्रतिनिधि मानना होगा। हल और कुदाल के बीच की यह लड़ाई बहुत लंबी चली।

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को “दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

संथाल विद्रोह ब्रिटिश शासनकाल में ज़मींदारों तथा साहूकारों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ किया गया था। आदिवासियों के विद्रोहों में संथालों का यह सबसे सशक्त विद्रोह था।

भागलपुर से राजमहल के बीच का क्षेत्र 'दामन-ए-कोल' के नाम से जाना जाता था। यह विशेष रूप से संथाल बहुल क्षेत्र था। यहाँ के हज़ारों संथालों ने गैर-आदिवासियों को भगाने और उनकी सत्ता समाप्त कर अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए जोरदार संघर्ष छेड़ा।

विद्रोह भूमिकर अधिकारियों द्वारा किये जाने वाले दुर्व्यवहार तथा ज़मींदार, साहूकार आदि द्वारा किये जाने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ किया गया था।
संथाल विद्रोह आर्थिक कारणों से बिहार और उड़ीसा के वीरभूम, सिंहभूम, बांकुड़ा, मुंगेर, हज़ारीबाग़ और भागलपुर के ज़िले में हुआ था।

विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता
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1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे – सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सिद्धू  ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा  करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् “ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.

 
जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.

संथाल विद्रोह का दमन
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ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.

अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.

संथाल विद्रोह का महत्त्व
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भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए।
                 Diwakar Kumar Thakur 

Sunday, April 19, 2020

सिकंदर का भारत अभियान......✍

सिकंदर का भारत अभियान
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●सिकंदर यूनान के मेसिडोनिया का शासक था और  उसके पिता का नाम फिलिप द्वितीय था।
●सिकंदर विश्वविजय की महत्वाकांक्षा रखता था अपनी इस महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए उसने भारत पर 326-27 ई.पू. में भारत पर आक्रमण किया।
●सिकंदर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर भारत अनेक छोटे छोटे राज्योँ मेँ विभक्त था, जिसमे कुछ कुछ राजतंत्रात्मक तथा कुछ गणराज्य थे।
●भारत मेँ सर्वप्रथम सिकंदर का सामना तक्षशिला के शासक अम्भी से हुआ। अम्भी ने शीघ्र ही समर्पण कर दिया और सिकंदर को सहायता का वचन दिया।
●सिकंदर का भारत मेँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण युद्ध झेलम नदी के तट पर पुरु या पोरस के साथ हुआ जिसे पितस्ता का युद्ध कहा जाता है।
●इस युद्ध को ‘हाइडेस्पेस का युद्ध’ भी कहा गया है। इस युद्ध में पोरस की हार हुई, लेकिन सिकंदर ने पोरस की बहादुरी से प्रभावित होकर उसका राज्य वापस कर दिया।
●पोरस की हार के बाद सिकंदर ने ‘गलॅागनिकाय’ तथा कुछ जातियो को भी पराजित किया।
●सिकंदर ने भारत मेँ दो नगरो की स्थापना की। पहला नगर ‘निकैया’ (विजय नगर) विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य मेँ तथा दूसरा अपने प्रिय घोड़े के नाम पर बुकफेला रखा।
●सिकंदर की सेना ने व्यास नदी से आगे बढने से इंकार कर दिया। सिकंदर ने सैनिकोँ मेँ जोश भरने का पूरा प्रयत्न किया किन्तु उसे इस कार्य में सफलता नहीँ मिली।
●सैनिकों के हठ के सामने सिकंदर अंततः सिकंदर को अपने भारत विजय के अभियान को रोकना पड़ा।
●सिकंदर ने विजित भारतीय प्रदेशोँ को अपने सेनापति फिलिप को सौंप कर वापस लौटने का निर्णय किया। सिकंदर भारत मेँ 19 महीने रहा।
●कहा जाता है की सिकंदर के लगातार युद्धों, घर परिवार की याद, भारत की गर्म जलवायु आदि ने उसकी सेना के हौसले पस्त कर दिए।
●सिकंदर भारत के शक्तिशाली मगध साम्राज्य पर आक्रमण करना चाहता था। लेकिन जब उसकी सेना ने मगध की विशाल सेना के बारे मेँ सुना तो वह घबरा उठी।
●सिकंदर ने भारत के आक्रमण के समय मगध एक शक्तिशाली राज्य था, जिस पर घनानंद नामक राजा का शासन था। घनानंद की सेना मेँ लगभग 6 लाख सैनिक थे।
●अपने देश मेसिडोनिया लौटते समय लगभग 323 ई.पू. में बेबीलोन में सिकंदर का निधन हो गया।

सिकंदर के भारत अभियान का प्रभाव
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1.सिकंदर की विश्व विजय की महत्वाकांक्षा ने उसे भारत विजय के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा अथवा सिकंदर के भारत अभियान ने प्राचीन यूरोप को, प्राचीन भारत के निकट संपर्क मेँ आने का अवसर प्रदान किया।
सिकंदर के इस भारत अभियान का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 2.था- भारत और यूनान के बीच विभिन्न क्षेत्रों मेँ प्रत्यक्ष संपर्क की स्थापना।
3.राय चौधरी के अनुसार सिकंदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप भारत की छोटी छोटी रियासतें समाप्त हो गईं।
डॉ राधा कुमुद मुखर्जी के अनुसार सिकंदर के भारत पर आक्रमण से राजनीतिक एकीकरण को प्रोत्साहन मिला, जिससे छोटे राज्य बड़े राज्यों में विलीन हो गए।
4.कला के क्षेत्र में गांधार शैली का भारत मेँ विकास यूनानी प्रभाव का ही परिणाम है।
6.यूनानियों की मुद्रण निर्माण कला का प्रभाव भारतीय मुद्रा कला पर दृष्टिगत होता है। उलूक शैली के सिक्के इसके उदाहरण हैं।
7.व्यापार के क्षेत्र मेँ पश्चिम के देशो के साथ जल मार्गों का पता चला, जिनका कालांतर में व्यापार पर अनुकूल प्रभाव पड़ा।

20 अप्रैल का इतिहास ....✍

23 अप्रैल का इतिहास ........✍

20 अप्रैल का इतिहास: आज के दिन हुआ था हिटलर का जन्म, अमेरिका में दो छात्रों ने मिनटों में ली 25 लोगों की जान......✍
देश दुनिया के इतिहास में 20 अप्रैल की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-
1592: अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि जॉन इलियट का जन्म।
1611: विख्यात उपन्यासकार विलियम शैक्सपियर के नाटक 'मैकबेथ'' का पहला ज्ञात मंचन हुआ।
1712 : जहांदार शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इस मुगल सम्राट ने 1713 तक शासन किया। वह बहादुरशाह का बड़ा पुत्र था।
1889 : जर्मन तानाशाह अडोल्फ हिटलर का जन्म।
1946: संयुक्त राष्ट्र की पूर्ववर्ती संस्था लीग ऑफ नेशन्स भंग की गई।
1953 : कोरिया और संयुक्त राष्टृ सेना के बीच बीमार युद्ध बंदियों का आदान प्रदान हुआ। रिहा किए गए 100 संयुक्त राष्टृ सैनिकों में ब्रिटेन के 12, अमेरिका के 30, दक्षिण कोरिया के 50 और कुछ अन्य देशों के सैनिक थे।
1960 : एयर इंडिया ने लंदन की अपनी पहली बोइंग 707 उड़ान के साथ जेट युग में प्रवेश किया।
1972: अपोलो 16 अंतरिक्ष यान छह घंटे तक इंजन की समस्या से प्रभावित रहने के बाद आखिरकार चंद्रमा पर उतरा।
1974 : सत्तर के दशक में आँतरिक हिंसा से बुरी तरह प्रभावित उत्तरी आयरलैंड के संघर्ष में मरने वालों की संख्या 1000 पहुँची।
1997: इंद्र कुमार गुजराल देश के 12वें प्रधानमंत्री बने।
1999 : अमेरिका के डेनवर शहर के एक स्कूल में दो छात्रों ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर 25 लोगों की जान ले ली। घटना में 15 अन्य लोग घायल हुए।
2010 : मैक्सिको की खाड़ी में स्थित गहरे पानी के तेल भंडार में विस्फोट से इतिहास का सबसे बड़ा तेल रिसाव हुआ।
2011 : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह प्रक्षेपण यान 'पीएसएलवी' ने तीन उपग्रहों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया।

PCS परीक्षा की तैयारी कैसे करें ...✍

उनलोगो के लिए जो अभी पीसीएस परीक्षा में सम्मिलित होने के इच्छुक है
मेरी तरफ से कुछ सुझाव --
1-पहली बात कि आप सर्वप्रथम पीसीएस प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा का
सिलेबस ले लीजिये । उसे दो चार बार बस पढ़ जाइए ताकि कम से कम आपको
सिलेबस याद तो रहे क्योंकि यही आगे आपको बताएगा कि क्या पढ़ना चाहिए
और क्या नहीं ।
2-दूसरी बात ये कि जब आप इस क्षेत्र में प्रविष्ट हो रहे है तो अन्यजगहों का
मोह माया त्याग दीजिये क्योंकि आप को शीघ्र अतिशीघ्र सफल होना है ।मन में
हमेशा यही गूँजना चाहिए कि बस अब आप को करना है , करना है ,करना है और
करना ही है ।
3-तीसरी बात कि आपको अब शुरू कहा से करना है चूँकि आपको अभी ए बी सी
डी भी नहीं आती है इसलिए आपका प्रारंभिक रास्ता सही होना चाहिए क्योंकि
यह काफी महत्वपूर्ण होता है । घबराने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है
क्योंकि जब मैं तैयारी में आया था तो उसवक्त मुझे भी कुछ नहीं आता था ये
सबके साथ होता है कोई माँ के पेट से सब कुछ सिख के नहीं आता अतः अज्ञात
भय निकाल के ध्यान से बात सुने
क-) A-4 शीट एक बण्डल ले लो क्योंकि मेरी रणनीति में लिखना अपरिहार्य
शर्त है । या फिर ब्लेंक कॉपी यानि बिना लाइन खींची हुई । काला ,नीला ,लाल
और हरा कलम का भी उचित प्रबंधन कीजिये ।
ख-) कुछ बुक्स लीजिय
आवश्यक
___________________________________
परिक्षावाणी की समस्त श्रृंखला
घटनाचक्र की समस्त श्रृंखला
__________________________________
इतिहास -
कक- युथ कॉम्पिटिशन की बुक जिसमे समस्त वर्षों के प्रश्न हल समाहित हो
कख- किरण पौब्लिकेशन की बुक जिसका कवर लाल रंग का है (वो ही ले जिन्हें
खुद के रटने की क्षमता पे भरोसा हो )
कग-आधुनिक भारत के इतिहास -स्पेक्ट्रम
कघ-घटनाचक्र इससे विगत वर्षों के प्रश्न को देखने से एक अनुमान विकसित
होता है कि आगामी प्रश्न कैसे होंगे ।
___वाकी मेरे नोट्स से आपको थोड़ी बहुत सहायता मिलेगी ।
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भूगोल
कक- वर्णवाल की
कख- एक एटलस( बाजार में जाके देखियेगा )
परीक्षा मंथन भारत व् विश्व दोनों
_____________________________
राजव्यवस्था -
कक-परीक्षा मंथन
परीक्षा वाणी
______________________________
अर्थशास्त्र
प्रतियोगिता दर्पण विशेषांक (पतली वाली)
परीक्षा वाणी
_______________________________
उत्तर प्रदेश विशेष
कक-परीक्षा मंथन
कख-परीक्षा वाणी
कग-मेरे नोट्स
________________________________
पर्यावरण व् पारिस्थितिकीय
कक-परीक्षा मंथन
कख-परीक्षा वाणी
_________________________________
विज्ञान
कक-NCERT
कख-लुसेंट
_________________________________
कृषि
कक-घटनाचक्र
कख-परीक्षा वाणी
कग- मेरे नोट्स
__________________________________
समसामयिकी
कक- nirdeshak (mobile app) आप प्ले स्टोर पे जाइए वहा से इंस्टॉल
कीजिये ।
कख-online tyari (mobile app)आप प्ले स्टोर पे जाइए वहा से इंस्टॉल
कीजिये ।
कग- gs hindi (facebook page) अपने फेसबुक से सर्च कीजिये और
इस पेज को लाइक कीजिये
कघ- दैनिक समसामायिकी (फेसबुक पेज है )
कच-कोई एक पत्रिका जैसे क्रोनिकल या प्रतियोगिता दर्पण या दृष्टि या
घटना चक्र ।
______________________________________
निबंध
कक-स्पेक्ट्रम
कख- समाचार पत्र
लिखने का अभ्यास
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शुरुआत कैसे करे --)
1-आप उस विषय को उठाइये जिसमे आपकी सबसे ज्यादा रूचि हो जैसे कुछ
लोग विज्ञान पढ़ना पसंद करते है तो कुछ लोग भूगोल तो कुछ लोग संविधान
ओके ।
2-अगर आप निर्णय नहीं ले पा रहे है तो कोई बात नहीं आप पहले संविधान और
इतिहास उठाइये और कुछ दिन सिर्फ उसे ऐसे ही देखिये । दो चार दिन बाद धीरे
धीरे आप को समझ में थोड़ा बहुत आने लगेगा । पहला चैप्टर उठाइये फिर - जैसे
उद्देशिका इसको दो बार पढ़िए तीन बार पढ़िए चार लड़िये फिर इससे सम्बंधित
प्रश्न देखिये कि कैसे पूछे गए है ।परिक्षावाणी की बुक में एक चैप्टर के बाद
उससे सम्बंधित प्रश्न दिए गए है ।
इसी तरह इतिहास का काम कीजिये जो न समझ में आये उसे रट लीजिये और कई
बार पढ़िए ध्यान रखिये पिछले वर्ष के प्रश्न जरूर देखिये ।
3- जो आपके निकटम हो उसके संपर्क में रहिये जो न समझ में आय उनसे पूछिये
याद रखिये आज भी दुनिया में बहुत अच्छे अच्छे लोग है वो आपको निःसंदेह सही
राय देंगे ।
4- चूँकि कुछ लोग पहले ncert पढ़ रहे है तो येभी अच्छी बात है उसमे से जो
प्रश्न आपको सही लगे उसे अपने नोट्स पे लिख लीजिये । सब कुछ लिख के याद
कीजिये अगर ऐसे नहीं याद हो रहा है तो ।
5-तैयारी अनवरत रखिये अक्सर मैं देखता हु कि लोग बेवजह समय बर्बाद
करते है जैसे दोपहर में खाके सोना (इलाहाबादी मित्रलोग अग्रणी है ) हर
शुक्रबार को मूवी देखना वगैरह वगैरह इन सब से बचिए थोडा ।कुछ लोग तैयारी
केदौरान रिश्ते नाते भी खूब निभाते है गर्मी में मामा के यहाँ चले गए शादी में जहाँ
2 दिन के लिए जाना चाहिए वह 10 दिन के लिए चले गए इन सब से भी बचिए
रिश्ते जो दिल के होते है वो जाने आने से नहीं बनते बिगड़ते ।
6- पीसीएस या जो भी बनना है उसके प्रति एक जूनून पैदा कीजिये रात हो
दोपहर हो या सुबह हो आपके सामने बस आपका लक्ष्य होना चाहिए बस करना
है तो करना है ।
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ये सब प्रारंभिक की रणनीति है ।
मुख्य परीक्षा के लिए आपको एक विषय चुनने है बस आपको जो सही लगे ले।
रोज एक एक प्रश्न हल कीजिये बस ख़त्म ।
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याद रखिये ये एग्जाम एक जंग है अंत तक टिके रहने वाला ही जीत हासिल कर
सकता है अतः पूरी ईमानदारी से लगिए सफलता निश्चित है ।


Saturday, April 18, 2020

बिरसा मुंडा आंदोलन ✍

बिरसा मुंडा आन्दोलन 
BPSC
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1857 ई. के बाद मुंडाओं ने सरदार आन्दोलन चलाया जो एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था. पर इससे आदिवासियों की स्थिति में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया. मुंडाओं ने आगामी आन्दोलन को उग्र रूप देने का निर्णय लिया. सरदार आन्दोलन के ठीक विपरीत बिरसा मुंडा आन्दोलन उग्र और हिंसक था. इस आन्दोलन के नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda), एक पढ़े-लिखे युवा नेता थे. यह आन्दोलन विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू किया गया था. इसलिए इसका स्वरूप भी मिश्रित था. यह आन्दोलन आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन और धार्मिक पुनरुत्थान जैसे विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने की इच्छा रखता था.
 चलिए पढ़ते हैं बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) के उद्देश्य, नेतृत्वकर्ता और परिणाम के बारे में – –

बिरसा मुंडा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य
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बिरसा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य था दिकू जमींदारों (गैर-आदिवासी जमींदार) द्वारा हथियाए गए आदिवासियों की कर मुक्त भूमि की वापसी जिसके लिए आदिवासी लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे. मुंडा समुदाय सरकार से न्याय पाने में असमर्थ रहे. इस असमर्थता से तंग आ कर उन्होंने अंग्रेजी राज को समाप्त करने और मुंडा राज की स्थापना करने का निर्णय लिया. वे सभी ब्रिटिश अधिकारीयों और ईसाई मिशनों को अपने क्षेत्र से बाहर निकाल देना चाहते थे. बिरसा मुंडा ने एक नए धर्म का सहारा लेकर मुंडाओं को संगठित किया. उनके नेतृत्व में मुंडाओं ने 1899-1900 ई. में विद्रोह किया.

बिरसा मुंडा का नेतृत्व
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बिरसा मुंडा आदिवासियों की दयनीय हालत को देखकर उन्हें जमींदारों और ठेकेदारों के अत्याचार से मुक्ति दिलाना चाहते थे. बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ने अनुभव किया था कि शांतिपूर्ण तरीकों से आन्दोलन चलाने का परिणाम व्यर्थ होता है. इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन को उग्र बनाने के लिए अधिक से अधिक नवयुवकों को संगठित किया. मुंडाओं ने उन्हें अपना भगवान् मान लिया. उनका प्रत्येक शब्द मुंडाओं के लिए मानो ब्रह्मवाक्य बन गया. बिरसा मुंडा ने घोषणा की कि कोई भी सरकार को कर नहीं दे. मुंडाओं ने उनकी बातें मानी और पालन किया.

बिरसा मुंडा गिरफ्तार
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1895 ई. में बिरसा मुंडा को विद्रोह फैलाने और राजविरोधी षड्यंत्र करने के अपराध में गिरफ्तार कर  लिया गया. उन्हें दो वर्ष की कैद की सजा मिली. जेल से रिहा होने के बाद वह और भी सक्रिय होकर और अधिक गर्मजोशी से आदिवासी युवाओं को आन्दोलन के लिए प्रेरित करने लगे. जंगल में छिपकर गुप्त सभाएँ आयोजित की जाती थीं और सभी को आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता था. वे स्वयं महारानी विक्टोरिया के पुतले पर तीरों से वार करके तीरंदाजी का अभ्यास करते थे. बिरसा मुंडा आन्दोलन में कई निर्दोष लोगों की भी हत्या हुई जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे सरकारी नौकर थे.

 
विद्रोह का दमन
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1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुंडाओं का व्यापक और हिंसक विद्रोह शुरू हुआ. सबसे पहले जो मुंडा ईसाई बने थे और जो लोग सरकार के लिए काम करते थे, उन्हें मारने का प्रयास किया गया लेकिन बाद में इस नीति में परिवर्तन किया गया क्योंकि अपना धर्म बदलने वाले मुंडा थे तो अपने ही समुदाय के! इसलिए उन्हें छोड़ सरकार और मिशनरियों के विरुद्ध आवाज़ उठने लगी. राँची और सिंहभूम में अनेक चर्चों में मुंडा आदिवासी समूह ने आक्रमण किया. पुलिस मुंडाओं के क्रोध का विशेष शिकार बनी. इस विद्रोह का प्रभाव पूरे छोटानागपुर में फ़ैल गया.

चिंतित होकर सरकार ने इस विद्रोह का दमन करने का निर्णय लिया. सरकार ने पुलिस और सेना की सहायता ली. मुंडाओं ने छापामार युद्ध का सहारा लेकर पुलिस और सेना का सामना किया लेकिन बन्दूक के सामने तीर-धनुष कब तक टिकती? फरवरी 1900 ई. में बिरसा एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें राँची के जेल में रखा गया. उनपर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया. मुक़दमे के दौरान ही बिरसा मुंडा को हैजा हो गया और 9 जून, 1900 ई. को उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया.

परिणाम
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बिरसा की मृत्यु के बाद बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) शिथिल पड़ गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी की सजा दी गई. अनेक मुंडाओं को जेल में ठूस दिया गया. परिणामस्वरूप बिरसा मुंडा आन्दोलन विफल हो गया. आदिवासियों को इस आन्दोलन से तत्काल कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ परन्तु सरकार को उनकी गंभीर स्थिति पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा. आदिवासियों की जमीन का सर्वे करवाया गया. 1908 ई. में  ही छोटानागपुर काश्तकारी कानून (Chotanagpur Tenancy Act, 1908) पारित हुआ. मुंडाओं को जमीन सम्बंधित कई अधिकार मिले और बेकारी से उन्हें मुक्ति मिली. मुंडा समुदाय आज भी बिरसा को अपना भगवान् मानता है.

Thursday, April 16, 2020

राज्य सभा

राज्य सभा ......✍

राज्यसभा  Bpsc✍
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राज्यसभा अपने नाम के अनुरूप राज्यों की परिषद है। यह अप्रत्यक्ष रूप से जनता का प्रतिनिधित्व करती है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा के सदस्यों की कुल संख्या 250 निश्चित की गई है। इनमें से 238 सदस्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों की संख्या संविधान की चौथी अनुसूची में अंकित की गई है। संविधान के अनुच्छेद 80(4) के अनुसार, राज्यों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन सम्बंधित राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। यह निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल वैकल्पिक मत द्वारा किया जाता है। जो व्यक्ति राज्यसभा का चुनाव लड़ना चाहता है उसका नाम विधानसभा के कम-से-कम 10 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित होना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 80(5) के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि संसद द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार मनोनीत अथवा निर्वाचित किये जाते हैं। राष्ट्रपति उन 12 व्यक्तियों को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करता है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त हो। वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं, जिनमें 233 सदस्य राज्यों एवं संघशासित प्रदेशों से निर्वाचित तथा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं।

राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर निश्चित किया जाता है। जिस राज्य की जनसंख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है, उस राज्य की अन्य राज्यों की अपेक्षा प्रतिनिधित्व भी अधिक दिया जाता है। उदाहरण के लिए, हरियाणा 5 प्रतिनिधि राज्यसभा में भेज सकता है जबकि अकेले उत्तर प्रदेश की 31 प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया है। राज्यसभा का पहली बार गठन 1952 में किया गया था ।

राज्यसभा के गठन में चार सिद्धांत निहित हैं- अर्ध संघीय, प्रतिनिधित्व सिद्धांत, संयुक्त पुनर्विचार और नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत तथा प्रख्यात और विशिष्ट व्यक्तियों को भारतीय राज-व्यवस्था से सम्बद्ध करने का सिद्धांत। राज्यसभा के गठन का निकट से अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यद्यपि इसके निर्वाचन की प्रक्रिया भिन्न है तथापि यह लोकसभा से मूलतः भिन्न नहीं है।

राज्यसभा की प्रासंगिकता
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आम चुनाव में जीतने वाली पार्टी लोकसभा में अपना बहुमत रखती है, किंतु राज्यसभा में ऐसा होना जरूरी नहीं होता। बहुमत प्राप्त विजयी दल का उल्लास तब ठंडा पड़ जाता है, जब कोई मामला या विधेयक राज्यसभा में अटक जाता है, जहां उसे बहुमत हासिल नहीं होता।

आलोचकों का मत है कि राज्यसभा वर्तमान यथार्थ की प्रतिबिंबित नहीं करती है तथा अनेक मामलों में जनादेश की अवहेलना करती है। उदाहरण के लिए, 1977 में जनता पार्टी सरकार को, 42वें संविधान संशोधन को निरस्त करने के, अपने चुनावी वायदे को पूरा करने में राज्यसभा के कारण अनेक कठिनाइयां उठानी पड़ीं। यह संशोधन आपातकाल के दौरान पारित किया गया था और इसी के विरोध में जन्मी प्रतिक्रिया के कारण जनता पार्टी को व्यापक जनादेश प्राप्त हुआ था।

 

संविधान निर्माताओं द्वारा राज्यसभा की निम्नलिखित भूमिकाओं को प्रकट किया गया था-

1.संघीय स्तर पर विधायी प्रक्रिया हेतु परिपक्व व वरिष्ठजनों (जो सक्रिय राजनीति की उठा-पटक या लोकसभा चुनावों की खुली प्रतिस्पर्द्धा में भाग लेने के इच्छुक नहीं होते) की सलाह व मार्ग-दर्शन को सुरक्षित रखना।
2.राज्यों को संसदीय स्तर पर, अपने दृष्टिकोणों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने हेतु समर्थ बनाना।
3.संसदीय विधायन के अंतर्गत कुछ हद तक नीतियों की निरंतरता को सुनिश्चित करना।

4.संसद के एक सदन के रूप में कार्य करना, जो न्यूनाधिक रूप में लोकसभा के साथ सहयोग करता है ताकि त्वरित प्रस्तावों पर दोनों सदनों के बीच पैदा किसी संघर्ष से बचने के रक्षोपाय खोजे जा सकें और विधायन कार्य सुगमतापूर्वक हो सके।

राज्यसभा के सदस्य (राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्यों को छोड़कर) राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। मनोनीत सदस्य विशिष्ट ज्ञान एवं व्यावहारिक अनुभव (साहित्य, विज्ञान, कला एवं समाज सेवा के क्षेत्र में) रखने वाले व्यक्ति होते हैं (अनुच्छेद 80)।

 राजनीतिक चालों से विलग तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले राज्यसभा के सदस्यों से सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि वे विभिन्न विधायी मानदंडों पर शांतिपूर्वक विचार-विमर्श करेंगे तथा राज्यसभा में वाद-विवाद की महत्ता पर निरंतर बल देते रहेंगे। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) में निर्दिष्ट किया गया है कि, किसी भी ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य के प्रतिनिधि अथवा राज्यों की परिषद के सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता, जो उस राज्य के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता नहीं है।  जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम का भाग-3 स्पष्ट करता है कि राज्यसभा का कोई सदस्य मात्र उसी राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिसका वह निवासी है। वर्ष 2003 में संसद ने जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर, राज्यसभा सदस्य के लिए उस राज्य विशेष के अधिवास की अपरिहार्यता को समाप्त कर दिया एवं साथ ही राज्यसभा के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था की भी समाप्त कर दिया। इस संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अगस्त 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में इस संशोधन की वैधता को स्वीकार किया। जबकि भाग-4 के अनुसार लोकसभा हेतु चुना जाने वाला प्रतिनिधि देश के किसी भी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता हो सकता है।

राज्यों की भागीदारी
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प्रत्येक राज्य की विधान सभा से राज्यसभा की होने वाला निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत आधारित आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के माध्यम से सम्पन्न होता है [अनुच्छेद 80(4)]। संविधान निर्माताओं का निर्णय था कि राज्यसभा की शक्ति राज्यों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में वितरित होगी। उस समय स्वीकृत मापदंड के अनुसार एक राज्य की 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि होगा तथा 50 लाख से ऊपर जाने पर प्रति 20 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि राज्यसभा में भेजा जायेगा। इसी मापदंड के अनुसार विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 1 से 34 के बीच में है। इस प्रावधान द्वारा यह आशा की गई थी कि यह प्रत्येक राज्य में उन अल्पसंख्यकों के निष्पक्ष प्रतिनिधित्व को संभव बनायेगा, जो बहुमत से भिन्न विचार रखते हैं। इसीलिए राज्यसभा राज्य विधान सभाओं से चुनी गयी पार्टियों के विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रतिनिधिक अंश का प्रतिनिधित्व करती है तथा संसदीय स्तर पर राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने का उपकरण बन जाती है।

यह उल्लेखनीय है की संविधान सभा द्वारा इस विचार को अस्वीकृत कर दिया गया था कि राज्यसभा में प्रत्येक राज्य से पांच सदस्य (व्यस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित) भेजे जाने चाहिए। राज्यसभा में सभी राज्यों के समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत इसलिए स्वीकार नहीं किया गया था कि संविधान के निर्माण से पहले भारतीय संघ के राज्य स्वतंत्र सत्ताओं के रूप में (अमेरिका की भांति) नहीं थे। दूसरा कारण भारतीय संघ के राज्यों की विशाल जनसंख्या एवं विस्तृत भू-भाग का होना था।

संविधान निर्माताओं ने राज्य सभा को एक स्थायी सदन के रूप में स्थापित किया है, जिसका विघटन नहीं किया जा सकता। राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष बाद सेवामुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था करने का उद्देश्य सार्वजनिक नीतियों की निरंतरता कायम रखने के अलावा पुराने एवं नये मतों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखना है।

क्या राज्यसभा विधान में बाधक है?
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संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार धन विधेयक के मामले में निम्न सदन (लोकसभा) का विचार मान्य होगा। धन विधेयकों के संबंध में राज्यसभा द्वारा सुझाये गये संशोधनों को मानना या न मानना लोकसभा पर निर्भर है (अनुच्छेद-109)। साथ ही धन विधेयकों या वित्तीय विधेयकों को राज्यसभा द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 109 एवं 117)। अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाला विचार-विमर्श एवं निर्णय केवल लोकसभा में ही होता है।

अन्य सभी विधेयकों के मामले में दोनों सदनों की शक्तियां लगभग समान हैं। गतिरोध की स्थिति को संयुक्त बैठक के माध्यम से दूर किया जाता है (अनुच्छेद-108), हालांकि इन संयुक्त बैठकों में लोकसभा का मत ही प्रभावी रहता है, क्योंकि इसके सदस्यों की संख्या (545) राज्यसभा के सदस्यों की संख्या (250) से अधिक होती है। किंतु, विरोधी दलों के पर्याप्त बहुमत की स्थिति में राज्यसभा विधेयक की विषय-वस्तु में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सकती है। पिछले दो दशकों से अनेक राज्यों में केंद्रीय सत्तारूढ़ दल से भिन्न दलों की सरकारें मौजूद रहीं हैं। इन भिन्न दलों या उनके समूहों द्वारा कुछ निश्चित राज्यों में बहुमत प्राप्त कर लिया जाता हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्यसभा में इनकी शक्ति काफी बढ़ जाती है। यही कारण है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सीटों का प्रतिशत राज्यसभा में, लोकसभा की तुलना में, कम होता है। वास्तव में कई अवसरों पर सत्तारूढ़ दल राज्यसभा में किसी संशोधन विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई मत जुटाने में असमर्थ रहता है। उदाहरणस्वरूप, 1977 एवं 1978 में प्रस्तुत क्रमशः 43वें एवं 44वें संविधान संशोधन विधेयकों का सत्तारूढ़ दल (लोकसभा में बहुमत प्राप्त) तथा मुख्य विपक्षी दल (राज्यसभा में बहुमत प्राप्त) के बीच हुए वृहद् समझौते के अभाव में पारित होना असंभव ही था।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि कड़े विरोध की दशा में राज्यसभा की स्थिति राज्यों की विधान परिषदों की तुलना में पूर्णतः भिन्न है। संसद के दोनों सदनों के बीच पैदा गतिरोध को हटाने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलायी जाती है जिसमें उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा अंतिम निर्णय किया जाता है। दूसरी ओर राज्य विधान सभा द्वारा दूसरी बार पारित विधेयक को स्वतः ही विधान परिषद द्वारा पारित मान लिया जाता है (अनुच्छेद-197)। साथ ही संसद की अनुमति से विधान सभाएं अपने दो-तिहाई बहुमत तथा कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार विधान परिषद का अवसान कर सकती है। इसके लिए संवैधानिक संशोधन जैसे कानून की आवश्यकता नहीं होती है (अनुच्छेद-169)।

क्या राज्यसभा वास्तव में राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है?
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राज्यसभा मात्र द्वितीयक विचारों का सदन नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों की संरक्षक भी है। अनुच्छेद-249 संसद को राज्य-सूची में शामिल विषयों के संबंध में विधि निर्माण की शक्ति प्रदान करता है, यदि राज्यसभा द्वारा इस आशय का प्रस्ताव (राष्ट्रीय हित में आवश्यक या उचित मानकर) उपस्थित या मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के साथ पारित किया गया है। इस प्रावधान पर विचार-विमर्श के दौरान संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णामचारी दो आधारों पर इससे असहमत थे-

इस विशिष्ट प्रावधान के उल्लंघन की संभावना, तथा;
सभी संघों में केंद्रीय शक्ति संचय की सार्वभौमिक प्रवृति।
उक्त असहमतियों के बावजूद इस प्रावधान को स्वीकार करने का कारण यह था कि संविधान सभा द्वारा राज्यसभा को अनुच्छेद-249 के उल्लंघन का एक विश्वसनीय रोधक मान लिया गया था। जैसा कि कृष्णामचारी द्वारा उद्धृत किया गया है कि केंद्र को राज्यसभा द्वारा अधिकृत किया जायेगा, जिसमें सभी राज्यों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होता है। राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से संसद को विधि निर्माण का अधिकार देना, यह संकेत देता है की राज्य केंद्र द्वारा ग्रहण की गई शक्ति से सहमत है। इससे इस मान्यता की पुष्टि हो जाती है कि राज्यसभा राज्यों की प्रतिनिधि है तथा उनके सामूहिक विचारों को अभिव्यक्त करती है।

यद्यपि सिद्धांत में, अनुच्छेद-249 के अधीन राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव राज्य विधान सभाओं और उनकी सरकारों के दृष्टिकोणों या सहमतियों को प्रतिबिंबित करता है किंतु व्यावहारिक रूप में सदैव ऐसा नहीं होता। अनेक उदाहरणों से पता चलता है कि कई बार राज्यसभा में प्रस्ताव का समर्थन करने वाले बहुमत दल का दृष्टिकोण राज्य सरकारों कको चलने वाले एवं राज्य विधान सभाओं में बहुमत प्राप्त करने वाले दलों से सीधा विरोध रखता है।

इस बात की भी संभावना मौजूद रहती है कि कुछ बड़े राज्य प्रस्ताव या विधेयक को पारित कराने हेतु जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की क्षमता रखते हों, जबकि छोटे राज्यों की एक बड़ी संख्या प्रस्ताव के विरुद्ध हो। 1986 में राज्यसभा द्वारा अनुच्छेद 249 के अधीन प्रस्ताव लाने पर कई बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों का मत एक दल या अन्य दलों अथवा छोटे राज्यों में सरकार चलाने वाले दलों द्वारा अप्रभावी बना दिया गया।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के निर्माण के दौरान कई राज्यों द्वारा दो सुझाव प्रस्तुत किये गये- प्रथम, प्रतिनिधित्व का नवीन मापदंड, तथा; दूसरा, राज्यसभा में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व। किंतु, आयोग द्वारा उक्त दोनों सुझाव रद्द कर दिये गये। आयोग का मानना था कि इनमें से कोई भी सुझाव बड़े राज्यों द्वारा कुचले जा रहे छोटे राज्यों के हितों या दृष्टिकोणों के बचाव हेतु अभेद्य सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने में समर्थ नहीं होगा। आयोग द्वारा कहा गया कि सुझाए गए उपचार बीमारी को अधिक गंभीर बना सकते हैं तथा राज्यसभा की मूल भूमिका पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं।

समस्या का मूल राज्यसभा की पुनर्रचना में निहित नहीं है बल्कि इस बात में है कि राज्यों के दृष्टिकोणों को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने वाले साधन के रूप में राज्यसभा की विशिष्ट भूमिका को किस प्रकार मजबूत किया जाए। सरकारिया आयोग के अनुसार, ऐसा राज्यसभा द्वारा अपनी आंतरिक कार्यवाही में प्रक्रियात्मक रक्षोपायों को अपनाकर किया जा सकता है। राज्यसभा अपने प्रक्रिया नियमों के द्वारा वास्तविक प्रतिनिधिक अंश की प्रतिबिंबित करने वाली एक विशेष समिति की स्थापना कर सकती है। यह समिति स्वतंत्र एवं खुले विचार-विमर्श द्वारा सदन में विभिन्न दलों के दृष्टिकोणों को सुनिश्चित कर सकती है तथा अनुच्छेद-249 या अनुच्छेद-312 के अधीन प्रस्तुत विधेयकों के बारे में पहले से ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि उक्त विधेयक मात्र सहमति के आधार पर ही पारित किये जायेंगे। यह प्रक्रियात्मक उपाय इन विशेष प्रस्तावों के दुरुपयोग संबंधी आशंकाओं को दूर करने में सफल होगा। यह कुछ बड़े राज्यों (जिनमें केंद्र में सत्तारूढ़ दल का ही शासन है) के व्यापक संख्यात्मक समर्थन के आधार पर केंद्र द्वारा हासिल विधि निर्माण शक्ति को छोटे राज्यों के हितों के प्रतिकूल होने से रोकेगा। यह राज्यसभा की इन विशिष्ट शक्तियों का प्रयोग सहकारी संघवाद के सिद्धांत के अनुकूल होना सुनिश्चित करेगा।

राज्य सभा चुनावों के लिए नए नियम
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अक्टूबर 2003 में नई दिल्ली में सम्पन्न एक सर्वदलीय बैठक में जन-प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 के अंतर्गत राज्य सभा चुनावों के लिए नियमों एवं विनियमों का अनुमोदन किया गया। संशोधित अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार,

1.प्रत्याशियों के लिए निवास संबंधी आवश्यकता का निवारण, तथा;
2.गुप्त मतदान प्रणाली के स्थान पर खुली मतदान व्यवस्था का अंगीकरण किया गया।
नए नियमों एवं विनियमों के अनुसार, राज्य सभा चुनावों में मतदान जहां दो चरणों (Two Tier) में होगा वहीं विधायकों द्वारा मतदान दलगत निर्देशों के अनुसार करना होगा।

अनुच्छेद-81 के अनुसार लोकसभा में राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए 530 से अधिक तथा संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए ऐसी रीति से जो संसद विधि द्वारा उपबंधित करे, चुने गए 20 से अधिक सदस्य नहीं होगे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति अधिक-से-अधिक दो सदस्य नामजद कर सकता है (अनुच्छेद 331)। इस प्रकार, संविधान में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 निश्चित की गई है। अनुच्छेद 81(2) के अनुसार प्रत्येक राज्य की लोकसभा में स्थानों का आबंटन ऐसी रीति से किया जाएगा कि स्थानों की संख्या से उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासाध्य एक ही हो। हालांकि यह धारा लोकसभा में उन राज्यों की स्थान आवंटित करने के संदर्भ में लागू नहीं होती, जिनकी जनसंख्या 6 मिलियन से अधिक नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्य का विभिन्न क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन हेतु प्रत्येक निर्वाचन क्षत्र की जनसंख्या व उसे आबंटित सीटों के मध्य का अनुपात, जो भी अधिक व्यावहारिक व उचित हो, को अपनाना होगा।

82वें अनुच्छेद के अनुसार राज्यों को लोकसभा में सीटों का आबंटन तथा प्रत्येक राज्य की क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन की प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए। यह पुनर्निर्धारण संसद द्वारा निर्मित विधि के अनुरूप किया जाना चाहिए। इस प्रकार, अनुसूचित जातियों व् अनुसूचित जनजातियों के निर्वाचन क्षेत्रों तथा प्रत्येक राज्य में लोकसभा (व राज्य में विधान सभा में) हेतु निर्धारित सीटों की संख्या में परिवर्तन किए बिना निर्वाचन क्षेत्रों का युक्तीकरण व पुनर्समायोजन किया जाना चाहिए।

2002 के 84वें अधिनियम के अनुसार तथा 2003 के सतासीवें संशोधन अधिनियम के पश्चात्,

लोकसभा में राज्यों की सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर रहेगा। महत्वपूर्ण है कि यह आधार वर्ष 2026 के बाद आई पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहेगा।
प्रत्येक राज्य का क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन के पुनर्समायोजन हेतु 2001 के संगणकों को आधार माना जाएगा (84वां संविधान संशोधन 1991 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति प्रदान करता है, जबकि 2003 का 87वां संशोधन 2001 की जनगणना के आधार पर) ।
अवधि

राज्यसभा की अवधि
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संविधान के अनुच्छेद 83(1) के अनुसार, राज्यसभा एक स्थायी सदन है अर्थात् यह कभी भी विघटित नहीं होता। संसद द्वारा निर्मित कानून के अनुसार राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इन सेवानिवृत्त सदस्यों के स्थान पर नये सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इस प्रकार राज्यसभा के सभी सदस्य 6 वर्ष तक अपने पद पर बने रहते हैं।

राज्यसभा के सभापति
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संसद के प्रत्येक सदन का अपना सभापतित्व करने वाला अधिकारी और सचिव तथा अन्य कर्मचारी होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 89 के अनुसार उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। राज्यसभा के सभापति को साधारणतया मत देने का अधिकार नहीं होता है क्योंकि वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है बल्कि उसे यह पद भारत का उप-राष्ट्रपति होने के कारण प्राप्त होता है। परंतु यदि किसी विषय पर पक्ष तथा विपक्ष में डाले गये मतों की गणना एक समान हो तो राज्यसभा के सभापति को निर्णायक मत डालने का अधिकार होता है। राज्यसभा का सभापति वे सभी कार्य करता है जो लोकसभा का अध्यक्ष करता है। अंतर इतना ही है कि लोकसभा अध्यक्ष को संविधान ने कुछ विशेष शक्तियां दी हैं। उदाहरण के लिए, धन विधेयक को प्रमाणित करना या दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन का पीठासीन अधिकारी होना। राज्यसभा अपने सदस्यों में से किसी एक सदस्य को उप-सभापति निर्वाचित करती है।

उल्लेखनीय है कि राज्यसभा के सभापति को वेतन उपराष्ट्रपति के रूप में मिलता है जो वर्तमान में 1.25 लाख रुपए प्रतिमाह निर्धारित किया गया है।

Wednesday, April 15, 2020

भारत की आर्थिक वृद्धि 2020-2021 की संभावना ✍

_*🇮🇳❄️भारत की आर्थिक वृद्धि 2020-21 में 1.9 प्रतिशत रहने का अनुमान: आईएमएफ*_
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आईएमएफ ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी और उसके कारण विश्व भर में आर्थिक गतिविधियां ठप होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था भीषण मंदी की ओर बढ़ रही है. यह साल 1930 में आयी महामंदी के बाद सबसे बड़ी मंदी है.

अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 14 अप्रैल 2020 को वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है. हालांकि, आईएमएफ ने कहा कि इसके बावजूद भारत दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था का तमगा अपने पास बरकरार रखेगा. वहीं, आईएमएफ ने इस दौरान चीन की वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.

आईएमएफ ने कहा कि कोरोना वायरस महामारी और उसके कारण विश्व भर में आर्थिक गतिविधियां ठप होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था भीषण मंदी की ओर बढ़ रही है. यह साल 1930 में आयी महामंदी के बाद सबसे बड़ी मंदी है. भारत में आर्थिक वृद्धि का यह स्तर रहता है तो यह साल 1991 में शुरू उदारीकरण के बाद सबसे कम वृद्धि दर होगी.

तीव्र वृद्धि से उभरती अर्थव्यवस्था👇🇮🇳

मुद्राकोष ने इसके बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट के नये संस्करण में भारत को तीव्र वृद्धि वाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में रखा है. भारत उन दो बड़े देशों में शामिल है जहां 2020 में वृद्धि दर सकारात्मक होगी. दूसरा देश चीन है जहां आईएमएफ के मुताबिक 1.2 प्रतिशत वृद्धि दर रह सकती है.

आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने क्या कहा?👇🇮🇳

आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि हमारा अनुमान है कि साल 2020 में वैश्विक वृद्धि में 3 प्रतिशत की गिरावट आएगी. यह जनवरी 2020 से 6.3 प्रतिशत की गिरावट है. इतने कम समय में बड़ा बदलाव किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी से सभी क्षेत्रों में वृद्धि दर प्रभावित होगी. गोपीनाथ ने कहा कि यह संकट गहरा है और इसके लोगों के जीवन तथा आजीविका पर प्रभाव को लेकर काफी अनिश्चितता है.

दुनिया की महामंदी👇🇮🇳

उल्लेखनीय है कि दुनिया की महामंदी साल 1929 में अमेरिका में शुरू हुई. उस समय न्यूयार्क शेयर बाजार में बड़ी गिरावट के साथ निवेशकों को लाखों डॉलर की चपत के बाद इसकी शुरूआत हुई थी.

आर्थिक वृद्धि में गिरावट👇🇮🇳

आईएमएफ की रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों की श्रेणी में ज्यादातर देशों की आर्थिक वृद्धि में गिरावट आएगी. इसमें अमेरिका (5.9 प्रतिशत की गिरावट), जापान (5.2 प्रतिशत की गिरावट), ब्रिटेन (6.5 प्रतिशत की गिरावट), जर्मनी (7.0 प्रतिशत की गिरावट), फ्रांस (7.2 प्रतिशत की गिरावट), इटली (9.1 प्रतिशत की गिरावट) और स्पेन 8.0 प्रतिशत की गिरावट में रह सकता है.

चीन में राजकोषीय में सुधार👇🇮🇳

रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन में अच्छी-खासी राजकोषीय सहायता के साथ साल 2020 की शेष अवधि में सुधार आएगा और वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है. क्षेत्र की कई अर्थव्यवस्थाओं में वृद्धि दर हल्की होने का अनुमान है. इसमें भारत (1.9 प्रतिशत) और इंडोनेशिया (0.5 प्रतिशत) शामिल हैं. वहीं थाईलैंड में 6.7 प्रतिशत की गिरावट के साथ  कुछ अन्य देशों में आर्थिक वृद्धि में गिरावट की अनुमान व्यक्त की गयी है.

आर्थिक वृद्धि में बड़ी गिरावट👇🇮🇳

मुद्राकोष के मुताबिक दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी आर्थिक वृद्धि में बड़ी गिरावट का अनुमान है. इसमें लातिन अमेरिका (5.2 प्रतिशत की गिरावट) शामिल हैं. ब्राजील में आर्थिक वृद्धि दर में 5.3 प्रतिशत और मेक्सिको में 6.6 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है.

उभरते और विकासशील यूरोप में वृद्धि दर में 5.2 प्रतिशत की गिरावट जबकि रूस की अर्थव्यवस्था में 5.5 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है. रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में वृद्धि दर में 2.8 प्रतिशत की गिरावट आने की आशंका हैं. इसमें सऊदी अरब की जीडीपी वृद्धि 2.3 प्रतिशत सिकुड़ सकती है.

2021 में आर्थिक वृद्धि दर👇🇮🇳

रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है कि साल 2021 में आर्थिक वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत जबकि चीन की 9.2 प्रतिशत रहेगी. वहीं अमेरिका और जापान की जीडीपी वृद्धि दर क्रमश: 4.5 प्रतिशत और 3.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है..........✍
     Diwakar Kumar Thakur 

Tuesday, April 14, 2020

बिहारी क्रांतिकारी 'पीर अली खान" .........✍

बिहारी क्रांतिकारी 'पीर अली खान "  1857
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  जिस तरह वीर कुँवर सिंह के नाम का ज़िक्र किये बग़ैर पुरे भारत मे हुए 1857 कि क्रांती का इतिहास अधुरा है ठीक उसी तरह ‘पीर अली ख़ान’ के कारनामो का ज़िक्र किये बग़ैर बिहार मे हुई 1857 कि क्रांती अधुरी है …

हाथों में हथकड़ियाँ, बाँहों में ख़ुन की धारा, सामने फांसी का फंदा, पीर अली के चेहरे पर मुस्कान मानों वे सामने कहीं मौत को चुनौती दे रहे हों। महान शहीद ने मरते-मरते कहा था, “तुम मुझे फाँसी पर लटका सकते हों, किंतु तुम हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मर जाऊँगा, पर मेरे ख़ुन से लाखो बहादुर पैदा होंगे और तुम्हारे ज़ुलम को ख़त्म कर देंगे।” कमिश्नर टेलर ने लिखा है कि पीर अली ने सज़ाए मौत के वक़्त बड़ी बहादुरी तथा निडरता का एहसास दिलाया।

 

पीर अली खान हिंदुस्तान को गुलामियों की बेड़ियों से आज़ाद करनवाना चाहते थे। उनका मानना था कि गुलामी से मौत ज्यादा बहेतर होती है। उनका दिल्ली तथा अन्य स्थानों के क्रांतिकारियों के साथ बहुत अच्छा सम्पर्क था। वे अजीमुल्लाह खान से समय-समय पर निर्देश प्राप्त करते थे। जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क में आता, वह उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।

वे साधरण पुस्तक विक्रेता थे, फिरभी उन्हें पटना के कद्दावर लोगो का समर्थन प्राप्त था। क्रांतिकारी परिषद्, पर उनका अत्यधिक प्रभाव था। उन्होंने धनी वर्ग के सहयोग से अनेक व्यक्तियों को संगठित किया और उनमें क्रांति की भावना का प्रसार किया। लोगों ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि वे ब्रिटिशी सत्ता को जड़मूल से नष्ट कर देंगे। जब तक हमारे बदन में खून का एक भी रहेगा , हम फिरंगियों का विरोध करेंगे, लोगों ने कसमे खाई।

3 जुलाई को पीर अली खान के घर सब मुसलमान इकट्‌ठे हुए और उन्होंने पूरी योजना तय की। 200 से अधिक हथियारबंद लोगो की नुमाइंदगी करते हुए पीर अली ख़ान ने गुलज़ार बाग मे स्थित प्राशासनिक भवन पर हमला करने को ठानी जहां से पुरे रियासत पर नज़र राखी जाती थी. ग़ुलाम अब्बास को इंक़लाब का झंडा थमाया गया , नंदू खार को आस पास निगरानी की ज़िम्मेदारी दी गई, पीर अली ने क़यादत करते हुवे अंग्रेज़ो के खिलाफ ज़ोरदार नारेबाज़ी की पर जैसे ही ये लोग प्राशासनिक भवन के पास पहुंचे , डॉ. लॉयल हिंदुस्तानी(सिख) सिपाहियों के साथ इनका रास्ता रोकने पहुंच गया. डॉ. लॉयल ने अपने सिपहयों को गोली चलने का हुकुम सुनाया , दोतरफा गोली बारी हुयी जिसमे डॉ. लॉयल मारा गया , ये ख़बर पुरे पटना में आग के तरह फैल गई.

पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने भीड़ पर अँधा दून गोली बरी हुक्म दिया जिसके नतीजे में कई क्रन्तिकारी मौके पर ही शहीद हो गए और दर्जनों घायल, फिर इसके बाद जो हुआ उसका गवाह पुरा पटना बना , अंग्रेज़ो के द्वारा मुसलमानो के एक एक घर पर छापे मारे गए , बिना किसी सबुत के लोगो को गिरफ़्तार किया गया , शक के बुनियाद पर कई लोगो क़त्ल कर दिया गया बेगुनाह लोगो मरता देख पीर अली ने खुद को फिरंगियों के हवाले करने को सोची इसी सब का फायदा उठा कर पटना के उस वक़्त के कमिश्नर विलियम टेलर ने पीर अली ख़ान और उनके 14 साथियों को 5 जुलाई 1857 को बग़ावत करने के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया।

चूँकि पीर अली खान और उनके साथियो ने 1857 में ‘वहाबी’ आन्दोलन का नेतृत्व किया था, क्योकि वो खुद इससे जुड़े थे , इनकी नुमाइंदगी “उलमाए सादिक़पुरीया” करते थे. इस लिए इनके मदरसे और बस्ती पर बिल्डोज़र चला दिया गया और बिल्कुल बराबर कर दिया गया , और सैंकड़ों की तादाद मे लोग काला पानी भेज दिए गए .. अंगरेज़ अपनी तरफ से पूरा बन्दोबस्त कर चुका था इसमे उस को कई साल लगे ॥

कमिश्नर विलियम ने पीर अली से कहा ‘अगर तुम अपने नेताओँ और साथियों के नाम बता दो तो तुम्हारी जान बच सकती है’ पर इसका जवाब पीर अली ने बहादुरी से दिया और कहा ‘जिन्दगी मे कई एसे मौक़े आते हैँ जब जान बचाना ज़रुरी होता है पर ज़िँदगी मे ऐसे मौक़े भी आते हैँ जब जान दे देना ज़रुरी हो जाता है और ये वक़्त जान देने का ही है..

 

अंग्रेजी हुकूमत ने 7 जुलाई, 1857 को पीर अली के साथ घासिटा, खलीफ़ा, गुलाम अब्बास, नंदू लाल उर्फ सिपाही, जुम्मन, मदुवा, काजिल खान, रमजानी, पीर बख्श, वाहिद अली, गुलाम अली, महमूद अकबर और असरार अली को बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया था।